शुक्रवार, 26 मार्च 2010

शोषण और प्रतिस्पर्द्धा का विलोप

प्रत्येक व्यक्ति प्राकृत रूप में भी अपनी आवश्यकता से बहुत अधिक उत्पादित करने की क्षमता रखता है  सभ्यता और वैज्ञानिक विकास कार्यों ने इस उत्पादन क्षमता को और भी अधिक संवर्धित किया है. इसलिए मानब जाति सही दिशा में चलने पर कभी अभावग्रस्त नहीं हो सकती. तथापि, आज विश्व की आधी से अधिक जनसँख्या अभावग्रस्त है और अभावों से सतत जूझ रही है. इसका कारण कुछ दुष्ट लोगों द्वारा राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक सत्ताओं पर अधिकार कर अन्य लोगों का सतत शोसन करते रहना. अतः शोषण ही आधुनिक विश्व की गंभीरतम विडम्बना है. महामानव सदैव शोषण-विहीन समाज की संरचना के प्रयासों में लगे रहते हैं ताकि कोई भी अभावग्रस्त न रहे और अन्य सभी मनुष्य मानवीय जीवन जी सकें.

विश्व में शोषण व्यवस्था का उद्गम धर्मों के रूप में हुआ जब चतुर लोगों ने जनसाधारण को ईश्वर के नाम से आतंकित करके उनपर अपने मनोवैज्ञानिक शासन स्थापित किये. विश्व के सभी अभावग्रस्त लोग धर्मान्धता के कारण ही आज भी पिछड़े हैं और चतुर लोगों के चंगुल में शोषण के शिकार हो रहे हैं.

आधुनिक विश्व में जो लोग अपनी चिन्तनशीलता के कारण धर्मान्धता के शिकार होने से बच गए, दुष्टों ने उनपर दूसरा मनोवैज्ञानिक प्रहार किया और उनमें यह धारणा पनपायी कि प्रतिस्पर्द्धा ही विकास की जननी होती है. इसे अंतर-मानव और अंतर-वर्ग संघर्ष पल्लवित और पुष्पित हुए जिनका लाभ दुष्ट लोग उठाते रहे हैं.

प्रतिस्पर्द्धा सदैव आवश्यकता और उपलब्धि के असंतुलन से पनपती है और यह असंतुलन नियोजन में त्रुटियों के कारण उत्पन्न होता है. उदाहरण के लिए भारत में इंजीनियर समुदाय अपनी रचनात्मकता के कारण प्रतिष्ठा के शीर्ष पर रहा है. किन्तु अभी शासन की रीति-नीति और नियोजन दोषों के कारण इस समुदाय का एक बड़ा भाग बेरोजगारी का शिकार बना दिया गया है. देश को अभी केवल ५०,००० इंजीनियरों के प्रति वर्ष उत्पादन की आवश्यकता है जबकि मूर्ख एवं दुष्ट शासकों ने ३,००,००० प्रति वर्ष इंजीनियरों के उत्पादन की व्यवस्था कर दी. इससे देश के बहुमूल्य संसाधनों की भी बर्बादी की जा रही है.

समुचित नियोजन से देश के संसाधनों का ही सदुपयोग नहीं होता, प्रत्येक नागरिक प्रतिस्पर्द्धा एवं शोषण विहीन होकर सुखपूर्वक जीवनयापन कर सकता है. किन्तु यह शासकों के हित में नहीं होता इसलिए वे कदापि ऐसा नहीं होने देते. धर्मों के माध्यम से शासन ने ही राजनैतिक शासन की नींव डाली है. इसलिए ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जैसा कि शोषण और प्रतिस्पर्द्धा का परस्पर सम्बन्ध है. ये सभी असंतुलन से ही जन्म लेते हैं और उसी से पनपते हैं.

असंतुलन उत्पन्न होने के दो कारण संभव हैं - दुष्टता और बुद्धिहीनता. नियोजन का अभाव अथवा दोष इन्ही दोनों कारणों से जन्म लेते हैं, और यही दो कारण मानवता के अभिशाप हैं. प्रतीत ऐसा होता है कि ये दो कारण एक दूसरे से निरपेक्ष हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि इन दोनों का घनिष्ठ है. प्रत्येक बुद्धि-संपन्न व्यक्ति चिंतनशील होता है और वह कदापि दुष्ट नहीं हो सकता. इसलिए दुष्टता केवल बुद्धिहीनता का परिचायक होती है और इसे इन दोनों में से किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है. महामानव इन दोनों का विरोध करता है.            

फतेहपुर सीकरी की सत्यता

आगरा के निकट एक प्रसिद्द एतिहासिक स्थल फतेहपुर सीकरी है जिसे अकबर द्वारा निर्मित बताया जा रहा है जबकि अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य सिद्ध कराते हैं कि अकबर से इसके निर्माण का कोई सम्बन्ध नहीं है. यह महाभारत से पूर्व देवों द्वारा बसाया गया एक लाल पत्थरों से बना नगर था जिसमें देव परिवार रहते थे. इसका निर्माण काल अब से लगभग २,५०० वर्ष पूर्व इस आधार पर सिद्ध होता है कि सिकंदर का भारत पर आक्रमण ईसापूर्व ३२३ में हुआ जिसके १५ माह बाद महाभारत युद्ध हुआ. इस युद्ध में सिकंदर उपस्थित था जिसे 'महाभारत' ग्रन्थ में शिखंडी कहा गया है तथा जो समलैंगिक मैथुन के लिए प्रसिद्द था. इसकी समलैंगिकता का चित्रण अभी कुछ वर्ष पहले हॉलीवुड से निर्मित फिल्म Alexander में भी किया गया है.

फतेहपुर सीकरी लगभग ४ वर्ग किलोमीटर क्षत्र में फैला एक नगर था जो ध्वस्त किया जाकर केवल कुछ भवनों तक सीमित कर दिया गया है. मुस्लिम शासकों द्वारा कब्रिस्तान में परिवर्तित किये जाने के बाद भी वर्तमान भवन भी वास्तुकला और सौन्दर्य के अद्भुत उदाहरण हैं. इसके मुख्य भवन के प्रांगण में सलीम चिश्ती का स्मारक बना है जो स्पष्ट रूप से बाद का निर्माण है और संभवतः यही अकबर द्वारा बनवाया गया था. अकबर के शासन काल में भी यह नगर इतना भव्य था कि उसने इसे अपनी राजधानी बनने का प्रयास किया. किन्तु उसके इंजीनिअर इस नगर के प्राचीन जल-प्रदाय संस्थान को सक्रिय न कर सके और वह इसे त्याग कर दिल्ली चला आया. यह विशाल जल संस्थान अब भी सुरक्षित है किन्तु इसे समझने और सक्रिय करने के कोई प्रयास वर्तमान सरकारी वेतनभोगी तथाकथित विशेषज्ञों ने नहीं किये हैं. यदि यह नगर तथा जल संस्थान अकबर द्वारा बनवाया गया होता तो उसे जलाभाव में यह नगर छोड़ने की विवशता नहीं होती. नगर के पश्चिमी किनारे पर एक जलधारा का सतत प्रवाह रहता है जिसके समीप ही जल-संस्थान स्थित है.

नगर के मुख्य भवन का द्वार बुलंद दरवाजा कहलाता है जिसके विशाल मुख पर ईसा मसीह का एक वाक्य उत्कीर्ण है जो अकबर कदापि नहीं कराता क्योंकि विश्व का सबसे लम्बा युद्ध ईसाई और इस्लाम धर्मावलम्बियों के मध्य हुआ है जो ६३० से आरम्भ होकर १९वीं शताब्दी तक चला है.

अकबर इस नगर में एक युद्ध में विजय प्राप्ति के बाद आया था, उस समय ऐसे भव्य नगर का निर्माण करना एक असंभव कल्पना है. नगर के एक भवन को आज भी 'सीताजी की रसोई' कहा जाता है जो इस नगर का देवों के साथ सम्बन्ध स्थापित करता है. जल संस्थान के दक्षिण में ऊंची चारदीवारी से घिरा एक प्रांगण है जिसके मद्य एक जलताल है. इस प्रांगण में देवी दुर्गा के पालतू शेर रखे जाते थे जिनपर सवारी कर वह दुष्टों का संहार करने जाया करती थीं. दुष्टों में उनका इतना आतंक था कि वे रात्रि भर जागृत रहते और देवी को प्रसन्न रखने के लिए उनके गुणगान कराते रहते. इसी प्रचलन को आज देवी-जागरण कहा जता है जो पुनजब क्षेत्र से फैलता हुआ उत्तरी भारत के अनेक क्षेत्रों में प्रचलित है. यही देवी दुर्गा मूलतः ईसा मसीह की बड़ी बाहें मरियम थीं जो विष्णु से विवाह होने के कारण 'विष्णुप्रिया' भी कहलाती थीं. विष्णु का एक नाम लक्ष्मण होने के कारण इन्ही देवी को 'लक्ष्मी' के रूप में भी जाना जाता है. वैश्य समाज की ये आराध्य देवी हैं क्योंकि वैश्य (गुप्त) वंश का आरम्भ इन्ही के पुत्र चन्द्र गुप्त मोर्य से हुआ. काली के रूप में भी ये शतरूप\ओं का संहार किया करती थीं.

Alexander - Director's Cut (Full Screen Edition)फतेहपुर सीकरी के मुख्य भवन के उत्तर में एक विद्यालय भवन है जहाँ देवों के बच्चे शिक्षा पाते थे. यह नगर उस समय बनाया गया जब यवन समुदाय ने देवों को सताना आरम्भ कर दिया था और देव पुरुष संघर्षों में व्यस्त रहते थे. इसलिए परिवारों को सुरक्षित रखने के लिए इस नगर को बसाया गया जिसकी चारदीवारी में केवल एक द्वार था जो पूर्व की ओर आज भी स्थित है. नगर के मुख्य भवनों में देव परिवार रहते थे तथा स्त्रियाँ ग्रंथों के लेखन का कार्य करती थीं. महाभारत की रचना प्रमुखतः इसी नगर में की गयी जिसमें देव स्त्रियों का प्रमुख योगदान है.     

मूषक

Bohorisशास्त्रों के भ्रमात्मक एवं प्रचलित अर्थों के अनुसार मूषक का अर्थ चूहा कहा जाता है जिसे एक सुप्रसिद्ध देव गणेशजी का वाहन कहा जाता है जो एक मूर्खतापूर्ण भाव है. शास्त्रों में यह शब्द ग्रीक भाषा के शब्द moschos का देवनागरी स्वरुप है जिसका हिंदी अर्थ कस्तूरी जैसी सुगंधि वाला किन्तु इससे भिन्न एक द्रव्य है. अतः गणेशजी के सन्दर्भ में मूषक शब्द का उपयोग गणेश जी द्वारा इस द्रव्य के बारे में अध्ययन को इंगित करता है. यह द्रव्य अनेक फलों जैसे भिन्डी, खरबूजा, आदि में भी पाया जाता है.   

गुरुवार, 25 मार्च 2010

पार्थ

Boston Marriages: Romantic but Asexual Relationships Among Contemporary Lesbiansपार्थ शब्द का उपयोग महाभारत में प्रचुर हुआ है जो ग्रीक भाषा के शब्द 'पर्ठेनोस' का देवनागरी स्वरुप है जिसका अर्थ 'मैथुन-विहीन' है अर्थात वह उत्पत्ति जिसमें मैथुन क्रिया का उपयोग न किया गया हो. आधुनिक संस्कृत में इस शब्द को अर्जुन का एक नाम कहा गया है जो एक भ्रांत धारणा है.
इसी शब्द का दूसरा उपयोग तत्कालीन 'पार्थिया' राज्य के लिए भी किया गया है जो जो वर्तमान पूर्वी इरान भूभाग पर स्थित था.

ऋग

Regal Entertainment Group Gift Card
ऋग्वेद जैसे शब्दों में उपयुक्त  ऋग शब्द लैटिन भाषा के शब्द regalis का देवनागरी स्वरुप है जिसका अर्थ 'शासक' अथवा 'शाही' है. तदनुसार ऋग्वेद में तत्कालीन शासन व्यवस्था का वर्णन है. विभिन्न अद्यात्मवादियों  ने इस शब्द के अपनी-अपनी इच्छानुसार अनेक अर्थ लिए हैं और इस वेद के प्रचलित अनुवाद पूर्णतः भ्रमात्मक हैं.

शत

Enough
शास्त्रों में यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द 'satis' से उद्भूत है जिसका अर्थ 'पूर्ण' अथवा 'पर्याप्त' है. शास्त्रों के प्रचलित अनुवादों में इसका अर्थ 'सौ' (१००) लिया गया है जिसके कारण शास्त्रों से प्राप्त भारत के इतिहास में अत्यधिक त्रुटियाँ उत्पन्न हुई हैं और विश्व स्तर पर इसे विश्वसनीय नहीं माना जाता.

प्राथमिक विद्यालय का संघर्ष

सन १९६१ में जब में कक्षा ९ में पहुंचा था, तभी से अब सन २००० में अपने व्यावसायिक कार्यों से निवृति पाने तक की लगभग ४० वर्ष की अवधि में प्रमुखतः गाँव से बाहर ही रहा हूँ यद्यपि यदा-कदा संपर्क बना रहा है. सन २००० में जब स्थायी निवास की दृष्टि से यहाँ लौटा तो लोगों को आश्चर्य हुआ, वे कभी कल्पना नहीं कर सके थे कि मैं चीफ इंजिनियर तक के पदों पर कार्य करने वाला व्यक्ति कभी स्थायी रूप से गाँव में रहूँगा.

गाँव में पिताजी के सामाजिक कार्य तथा उनकी लोकप्रियता मुझे विरासत में प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं हुई. गाँव में कुछ दबंगों ने अपना शासन स्थापित कर लिया था और वे अपनी इच्छानुसार लोगों और उनके साधनों का शोषण कर रहे थे. लोग उनसे दुखी थे किन्तु उनका विरोध यदा-कदा ही कर पाते थे. मेरा गाँव में आना उन्हें अच्छा लगा और मुझे एक गाँव-वासी की तरह तुरंत स्वीकार कर लिया गया.

सन ५६ में पिताजी ने गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय का भवन बनवाया था जहाँ राजकीय विद्यालय उसी समय से चल रहा था. यह बस्ती के अन्दर होने के कारण बच्चों के लिए सुविधाजनक था. मुझे सूचित किया गया कि गाँव का तत्कालीन प्रधान अपने कुछ मित्रों के सहयोग से उक्त प्राथमिक विद्याके को गाँव से बाहर ले जाने की योजना बना रहा है जो गाँव वालों को पसंद नहीं है. मैं गाँव प्रधान से मिला और विद्यालय के स्थापन का कारण पूछा तो मुझे बताया गया कि विद्यालय जिस भूमि पर बना है वह कुछ समय के लिए दान में ली गयी थी और उस दानदाता का उत्तराधिकारी उस भूमि की वापिसी की मांग कर रहा है. उसने सम्बंधित अधिकारियों को इस विषयक वैधानिक नोटिस भी भेज दिया था.

मैंने गाँव वालों की एक सभा बुलाई और उनसे विद्यालय के प्रस्तावित विस्थापन के बारे में उनके विचार आमंत्रित किये. प्रधान समूह के कुछ लोगों के अतिरिक्त शेष गाँव-वासी विद्यालय को वहीं रखने के पक्ष में थे और उनका कहना था कि नवीन प्रस्तावित स्थल गाँव के तालाब के पास है जिसमें कुछ समय पूर्व ही गाँव के तीन-चर बच्चे डूब कर मर चुके थे. दूसरा नए स्थान पर गाँव-वासियों को आगामी चुनावों में स्वतंत्र मतदान नहीं करने दिया जायेगा क्योंकि वह प्रधान समूह के लोगों से घिरा है और गाँव के बाहर किनारे पर है. मुझे यह सब तर्क-संगत लगा और प्रधान से विद्यालय को पुराने स्थान पर ही रखने का आग्रह किया, किन्तु सत्ता के मद से चूर दबंगों ने मेरे सुझाव को अस्वीकार कर दिया और अपनी इच्छानुसार कार्य करने का संकल्प दोहराया. यह गाँव वालों को स्वीकार नहीं था इसलिए मैंने उक्त विस्थापन न होने देने का संकल्प लिया.

गाँव में वैचारिक संघर्ष छिड़ गया - एक ओर निर्बल वर्ग का बहुमत और दूसरी ओर सबल वर्ग का अल्पमत. मैंने सम्बंधित अदिकारियों को गाँव वालों का विरोध दर्शाते हुए पात्र लिख दिए किन्तु उनका कोई प्रभाव नहीं हुआ और नए स्थान पर विद्यालय भवन निर्माण कार्य आरम्भ कर दिया गया. एक ओर गाँव-वासियों को संगठित करने तथा दूसरी ओर प्रशासनिक अधिकारियों को वस्तु-स्थिति से अवगत कराते हुए उनसे निर्माण कार्य के लिए धन न देने का अभियान चल पड़ा जिसमें प्रधान वर्ग के अतिरिक्त गाँव के सभी वर्गों का सहयोग मिला. इस पर भी शिक्षा विभाग ने निर्माण हेतु धन प्रदान कर दिया.

अंततः यह विवाद जिलाधिकारी तक पहुंचा जो हमारे प्रतिनिधियों के तर्कों के समक्ष विद्यालय को पुराने स्थल पर ही रखने का आदेश दे देता तो दूसरी ओर कुछ राजनेताओं के दवाब में आकर विद्यालय स्थानांतरण के आदेश दे देता. इस कारण से निर्माण कार्य चलता रहा. मैं बुलंदशहर स्थित मुहाफिजखाने में गया जहां प्राचीन दस्तावेज़ संग्रहित रखे जाते हैं, और सन १९५४ से आगे के अपने गाँव संबंधी आलेखों की जांच आरम्भ की जिस पर मैंने पाया की विद्यालय की भूमि गाँव-सभा के नाम पर पिताजी ने १,००० रुपये में खरीदने के बाद उस पर भवन बनाया था. इस दस्तावेज की प्रतिलिपि प्राप्त कर ली गयी.
 
दस्तावेज को लेकर मैं कुछ गाँव-वासियों को साथ लेकर उप जिलाधिकारी कार्यालय पर धरना देने पहुँच गया आर उसे दस्तावेज़ दिखाया. आरम्भ में उप जिलाधिकारी ने हम सबको भयभीत कर भगाने का प्रयास किया जिस पर मुझे आवेश आ गया और मैंने उप जिलाधिकारी को धमकी दी कि मुझे वही करना पड़ेगा जो मेरे पिताजी अँगरेज़ अधिकारियों के साथ किया करते थे. देश में जनता का शासन है और उस जैसे अधिकारी केवल सेवक मात्र थे और उसे चेतावनी दी कि वह शहंशाह बनने का प्रयास न करे.

उसकी समझ में मेरी धमकी आ गयी और उसने मुझसे विनम्रतापूर्वक पूछा कि मैं क्या चाहता था. मैंने उसे बताया कि पुलिस को आदेश देकर निर्माण कार्य तुरंत रोका जाये, और विद्यालय का नवीन भवन पुराने स्थान पर ही बनाया जाये. उसने पुलिस को आदेश किया औए उसे मुझे थमा दिया कि मैं पुलिस को वह आदेश दे दूं. गाँव में एक पुलिस निरीक्षक पहुंचा और निर्माण कार्य रोकने के स्थान पर उसे तीव्र गति से पूर्ण करने का व्यक्तिगत परामर्श देकर चला आया. इसकी सूचना मुझे मिल गयी और मैंने उप जिलाधिकारी को फ़ोन पर इसकी सूचना देते हुए बताया कि मैं गाँव-वासियों के साथ पुनः धरना देने आ रहा हूँ. किन्तु उसने मुझसे न आने का सुझाव दिया और आश्वासन दिया कि निर्माण कार्य रोक दिया जायेगा. उसने स्वयं आकर निर्माण कार्य रोक देने का आदेश दे दिया जिसका तुरंत अनुपालन हुआ.

अगले ही दिन जिलाधिकारी ने राजनेताओं के दवाब में आकर निर्माण कार्य पूरा करने का आदेश दे दिया और कार्य तीव्र गति से आरम्भ कर दिया गया. अब मेरे पास गांधीजी के सर्ताग्रह के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग शेष नहीं था..रात में ही विद्यालय प्रांगण में पंडाल लगवा दिए गए, और मैं जिलाधिकारी, पुलिस और मुख्य चिकित्साधिकारी को सूचित कर प्रातः आमरण भूख हड़ताल पर बैठ गया. गाँव वालों की भीड़ मेरे पास जमा रहने लगी. स्थानीय समाचार पत्रों में समाचार प्रकाशित होने लगे और आसपास के गाँव वाले भी मेरे समर्थन में एकत्र होने लगे. २५०० की जनसँख्या वाले गाँव में मेरे आसपास लगभग १००० स्त्री-पुरुषों का समुदाय मेरे पास रहने लगा.

A Fine, Fine Schoolभूख हड़ताल के तीसरे दिन उप जिलाधिकारी, पुलिस क्षेत्राधिकारी और एक पुलिस दल कुछ मजदूरों को लेकर मेरे पास पहुंचे और मुझसे पूछा कि वे कहाँ बैठें ताकि दोनों पक्षों के दस्तावेजों की जांच कर सकें. मैंने कहा कि वे मेरे पास भूमि पर ही बैठकर जांच करें. दूसरे पक्ष को भी बुला लिया गया और उनका पक्ष भी सुना गया. अंततः मुझसे पूछा गया कि विद्यालय के नए बावन की नींव की खुदाई कहाँ होनी थी और गाँव-वासियों के सुझावानुसार खुदाई आरम्भ कर दी गयी. साथ ही प्रधान पक्ष को भी आदेश दिया गया कि वे दूसरे स्थान पर हुए निर्माण को ध्वस्त कराएँ और सभी निर्माण सामग्री को इसी स्थान पर लाकर भवन निर्माण आरम्भ करें. संतोषजनक आश्वासन पर भूख-हड़ताल समाप्त कर दी गयी.

इस प्रकरण से जहाँ मुझे नैतिक बल मिला वहीं गाँव-वासियों को मेरी कार्य पद्यति पर विश्वास भी हो गया. यह मेरा प्रथम सामाजिक प्रयोग था जो पूर्णतः सफल रहा.   

मंगलवार, 23 मार्च 2010

मेरा गाँव खंदोई

मेरा गाँव खंदोई देश के कृषि प्रधान क्षेत्र गंगा-यमुना दोआब में गंगा नदी से केवल ४ किलोमीटर की दूरी पर बुलंदशहर जनपद में स्थित है. यह क्षेत्र कला और संस्कृति की दृष्टि से बहुत अधिक पिछड़ा है तथापि राजनैतिक चेतना से भरपूर है. किन्तु यह राजनैतिक चेतना देश की राजनीति की तरह ही निजी स्वार्थों पर केन्द्रित है, देश और समाज के हितों से इसका कोई सरोकार नहीं रह गया है. परन्तु यह सदा से ऐसा नहीं था.

देश के स्वतन्त्रता संग्राम में मेरे गाँव का योगदान दूर तक जाना जाता था जिसका क्षत्रीय नेतृत्व मेरे पिताजी श्री करनलाल करते रहे थे. पिताजी की राजनैतिक चेतना १९४० से आरम्भ होकर १९९० तक सक्रिय रही जिसके दौरान वे देश की स्वतंत्रता के लिए तथा बाद में समाजवादी आंदोलनों में लगभग बीस बार जेल गए. इन जेल यात्राओं में देश में १९७६-७७ की आपातस्थिति भी सम्मिलित है जब जवाहरलाल नेहरु की पुत्री इंदिरा गांधी ने देश पर अपनी तानाशाही थोपी थी और देश-भक्तों से कारागारों को भर दिया था. यह देश के राजनैतिक पतन का आरम्भ था जो उग्र होता रहा और पिताजी राजनीति से शनैः-शनैः दूर होते गए.

१९७७ से ही पिताजी ने ग्राम-स्तर की राजनीति का परित्याग कर दिया था जिससे गाँव की राजनैतिक सत्ता धीरे-धीरे असामाजिक तत्वों ने हथिया ली. ऐसा ही पूरे देश में भी हुआ है अतः देश के प्रत्येक गाँव की राजनैतिक स्थिति देश की राजनैतिक स्थिति का ही प्रतिबिम्ब है, मेरा गाँव भी इसका अपवाद नहीं रह पाया है. गाँव में शिक्षा केवल नाम मात्र के लिए रह गयी है, शराबखोरी बच्चों को भी डस रही है, विकास और समाज कल्याण के नाम पर केवल भृष्टाचार व्याप्त है. सार्वजनिक संपत्तियों पर सामर्थ्यवानों के निजी अधिकार स्थापित हैं. बिजली की चोरी अधिकार समझी जाने लगी है और इसका खुला दुरूपयोग किया जा रहा है. विद्युत् अधिकारी इसके प्रति उदासीन हैं अथवा इसके माध्यम से अपनी जेबें भर रहे हैं. जनसाधारण अपने जीवन-यापन की व्यक्तिगत समस्याओं में इतना उलझा है कि उसके जीवन में मानवीय चिंतन के लिए कोई स्थान शेष नहीं रह गया है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति सबकुछ निजी स्वार्थों की आपूर्ति हेतु ही करता है, सामाजिक चिंतन उसकी जीवन चर्या और बुद्धि से बहुत दूर हो गया है.

ऐसी स्थिति में मैं अब से लगभग ५ वर्ष पूर्व सन १९६१ के बाद यहाँ स्थायी निवास के लिए आ पहुंचा हूँ और यहाँ की स्थिति देखकर दुखी हूँ. इसी संवेदना से उदित हुआ है मेरा यह संलेख जो यहाँ मेरे सामाजिक और राजनैतिक सरोकारों और प्रयोगों का एक झरोखा होगा.    

नाट्य, नाशी

Nationवेदों और शास्त्रों में उपयुक्त 'नाट्य' शब्द लैटिन भाषा के शब्द 'natio' से बनाया गया है जिसका अर्थ 'राष्ट्र' अथवा 'जाति' होता है. वर्तमान में एक राष्ट्र में अनेक जातियों के उपस्थित होने तथा एक जाति के अनेक राष्ट्रों में उपस्थित होने से 'राष्ट्र' एवं 'जाति' शब्दों के अर्थ भिन्न हो गए हैं. किन्तु शास्त्रों के रचना काल में एक जाति के क्षेत्र को ही एक राष्ट्र कहा जाता था.
natio शब्द से ही लैटिन का शब्द nasci सम्बंधित है जिसका अर्थ 'जन्म देना' है. इसका देवनागरी स्वरुप 'नाशी' है. इस प्रकार नाट्य शब्द 'राष्ट्र' के सापेक्ष 'जाति' के अधिक निकट है.    

देव


Theo and the Blue Noteशास्त्रीय शब्द 'देव' लैटिन भाषा के शब्द theo से उद्भूत है जो उस मानव जाति के नाम के रूप में उपयुक्त किया गया जिसने बारतीय उपमहाद्वीप पर मानव सभ्यता का विकास आरम्भ किया था. पुरु वंश इसी जाति का अंग था जो मूलतः अब थाईलैंड कहे जाने वाले भूभाग पर रहता था और उत्तरी भारतीय क्षेत्र पर विकास कार्य आरम्भ किये थे. ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर इसी वंश के तीन भाई थे जिन्हें क्रमशः राम, लक्ष्मण, भरत बी कहा जाता है. कृष्ण के नेतृत्व में यवनों ने इनके विकास कार्य में व्यवधान उत्पन्न किये तथा महाभारत युद्ध में भारत की राजसत्ता हथिया ली. बाद में विष्णु ने विष्णु गुप्त चाणक्य नाम से उस पराजय का बदला लिया और चन्द्र गुप्त मौर्य को सम्राट बना भारत भूमि पर गुप्त वंश के साम्राज्य का सूत्रपात किया. इस प्रकार भारत का वर्तमान वैश्य समाज ही देव जाति का वर्तमान प्रतिनिधि है.

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

शिक्षा व्यवस्था

बौद्धिक जनतंत्र में अकादमी शिक्षा के पांच स्तर निर्धारित किये गए हैं -

  1. प्राथमिक शिक्षा - ५ वर्ष,
  2. आधारिक शिक्षा - ४ वर्ष, 
  3. माध्यमिक शिक्षा - ३ वर्ष, 
  4. स्नातक शिक्षा - ३ वर्ष,
  5. स्नातकोत्तर शिक्षा - ३ वर्ष

इनमें से माध्यम के तीन वर्गों के पश्चात तकनीकी एवं व्यावसायिक  प्रशिक्षा के प्रावधान हैं, जिनको निम्नांकित चार्ट में दर्शाया गया है -
उपरोक्त चार्ट में प्रशिक्षा क्षेत्र में वर्त्तमान की तुलना में कुछ परिवर्तन दर्शाया गया है, जो इंजीनियरिंग एवं चिकित्सा आदि व्यावसायिक प्रशिक्षाओं के बारे में हैं, वर्तमान में ये प्रशिक्षएं माध्यमिक शिक्षा के पश्चात् दी हा रही हैं और ४/५ वर्ष की हैं. इनमें परिवर्तन करके ये प्रशिक्षएं स्नातकोत्तर होंगी और ३ वर्ष की अवधि की होंगी. 

उक्त विविद शिक्षा एवं प्रशिक्षा क्षेत्रों में देश की आवश्यकतानुसार संस्थानों की स्थापना एवं उनका विकास किया जायेगा ताकि मानव संसाधन का किसी भी क्षेत्र में न तो बहुलता हो और न ही अभाव. स्पर्द्धा को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से कठोर नियोजन एवं अनुपालन द्वारा विलुप्त कर दिया जायेगा ताकि नागरिकों के जीवन तनाव-मुक्त बन सकें. वर्त्तमान में, मानव संसाधन नियोजन का नितांत अभाव है जिससे अभावों और प्रतिस्पर्द्धाओं का संवर्धन हुआ है और अधिकाँश नागरिक तनावग्रस्त हैं.  .

जैसा कि इस संलेख में बार बार कहा जा चुका है, देश में सभी शिक्षा एवं प्रशिक्षाएं निःशुल्क होंगी तथा इन्हें प्राप्त करने के अवसर सभी नागरिकों को एक समान रूप से उपलब्ध होंगे. इस उद्देश्य से देश भर में फैले निजी शिक्षा, प्रशिक्षा संसथान बंद कर दिए जायेंगे ताकि शिक्षा के क्षेत्र में धनाढ्यता के आधार पर अंतराल न हो जैसा कि अभी हो रहा है.

गुरुवार, 18 मार्च 2010

यक्ष्मा

Loma Lux Homeopathic Medicine, Eczema, 100 Tablet Bottleशास्त्रों में 'यक्ष्मा' शब्द ग्रीक भाषा के शब्द eczema से उद्भूत है जिसका अर्थ 'त्वचा में खुजलाहट वाला एक विकार' है. किन्तु आधुनिक संस्कृत में इसका अर्थ 'श्वसन तंत्र का रोग' लिया गया है जिसे उर्दू में तपेदिक कहते हैं. अतः आयुर्वेद में जो औषधि त्वच रोग के उपचार हेतु निर्धारित है आयुर्वेदाचार्य उसका उपयोग श्वसन तंत्र के रोग के उपचार के लिए कर रहे हैं और रोगियों का सत्यानाश कर रहे हैं. ऐसे कृत्यों से हमारा शास्त्रीय ज्ञान कुख्यात हो रहा है.  

व्यक्तिगत एवं सामाजिक दृष्टिकोण

हम में से प्रत्येक व्यक्ति दो प्रकार के उद्देश्यों के लिए कार्य करता है - व्यक्तिगत हितों के लिए तथा सामाजिक व्यवस्था के लिए. इन दो उद्देश्यों के लिए हमारे दायित्व भिन्न होते हैं इसलिए हमारी भूमिकाएं भी भिन्न होनी चाहिए. इसलिए प्रत्येक सभ्य नागरिक को दो भिन्न दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है - व्यक्तिगत और सामाजिक. उदाहरण के लिए, परिवार के पालन-पोषण के लिए व्यक्तिगत दृष्टिकोण का महत्व है जबकि शासन व्यवस्था में मतदान द्वारा योगदान के लिए सामाजिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होता है.

सन्दर्भ के अनुकूल दृष्टिकोणों का यह अंतराल वांछित है  किन्तु अधिकाँश व्यक्ति व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए सामाजिक दृष्टिकोण को नकार देते हैं. यही मानव की निर्बलता है जो उसे पशुता की ओर ले जाती है. भारत की शासन व्यवस्था में इसे स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है.

किसी भी व्यक्ति को निजी दायित्वों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए और इसके लिए निजी हितों का पोषण करना आवश्यक होता है. साथ ही किसी भी मनुष्य को अपने सामाजिक दायित्वों से भी विमुख नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मानवता की एक श्रेष्ठ व्यवस्था - सामाजिकता, से लाभान्वित नहीं हो सकता, साथ ही सामाजिक व्यवस्ता को प्रदूषित कर समाज के दूसरे सदस्यों के लिए भी कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है. इन दोनों भूमिकाओं के सफल निर्वाह के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि व्यक्ति अपने अपने सामाजिक दायित्व निर्वाह में भी अपने निजी हितों की संतुष्टि को समझे. सामाजिक दायित्व निर्वाह से सामाजिक व्यवस्था स्वस्थ बनी रहती है जिससे समाज के सभी अंगों के हित साधित होते हैं. निजी स्वार्थों के लिए इनकी बलि देने से व्यक्ति स्वयं सामाजिक व्यवस्था को प्रदूषित कर अपना भी अहित करता है.

सामाजिक व्यवस्था के प्रदूषण के दुष्प्रभाव को व्यक्ति इसलिए अनुभव नहीं करता क्योंकि इनका प्रभाव उस पर अल्प किन्तु उसकी भावी पीढ़ियों पर गंभीर होता है. चूंकि भावी पीढ़ियों का हित भी व्यक्ति के निजी हितों का पोषण होता है इसलिए वस्तुतः सामाजिक हित चिंतन भी निजी हितों का सुदूर पोषण होता है.

व्यक्ति की आयु का उस पर निजी हितों के भार का सीधा सम्बन्ध होता है  आयु वृद्धि के साथ-साथ निजी दायित्व न्यून होते जाते हैं और आदर्श स्थिति में ५० वर्ष की आयु में ये शून्यस्थ हो जाने चाहिए. इसलिए, अतः युवा अवस्था में व्यक्ति पर निजी दायित्वों का भार अधिक होता है, ऐसी अवस्था में उसके द्वारा सामाजिक दायित्वों की अवहेलना होना संभव है इसके लिए उसे पूर्णतः दोषी नहीं ठहराया जा सकता, सामाजिक व्यवस्था की तत्कालीन स्थिति भी इसके लिए दोषी हो सकती है जो समाज के ज्येष्ठ वर्ग और व्यत पीढ़ियों की देन होती है. किन्तु आयु वृद्धि के साथ भी यदि व्यक्ति सामाजिक दायित्वों की अवहेलना करता है तो उसका अपराध अक्षम्य होता है. ऐसा व्यक्ति अपनी पशुता के कारण मानवता के ऊपर अवांछित भार होता है.

अविकसित तथा भारत जैसे अर्ध-विकसित देशों में जनसाधारण अपनी पशुता से ऊपर नहीं उठ पाए हैं, यदा कदा जो सुधार होते हैं, सामाजिक व्यवस्था के प्रदूषण से वे पुनः विलुप हो जाते हैं. ऐसे समाजों में पशु गुण संपन्न व्यक्तियों को ही मानव कहा जाने लगता है. इस कारण से जो व्यक्ति पूरी सावधानी से अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते हैं वे महामानवता के पथ पर अग्रसर कहे जा सकते हैं. आधुनिक विश्व में लेव तोल्स्तोय, महात्मा गाँधी, सुभाष बोस, अब्राहम लिंकन, आदि महामानव बनते रहे हैं. 

बुधवार, 17 मार्च 2010

मरियम के मकबरे का छल

आगरा के निकट सिकन्दरा में अकबर के मकबरे के सामने सड़क के दूसरी ओर कुछ आगे एक मकबरा और है जिसे 'मरियम का मकबरा' कहा जाता है. इस मकबरे के प्रवेश द्वार के निकट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक बोर्ड लगाया हुआ है जिसमें बताया गया है कि 'मरियम' अकबर की पत्नी जोधाबाई की ही उपाधि थी और इस प्रकार इस मकबरे को जोधाबाई का मकबरा सिद्ध किया गया है. भारत के अकबर कालीन इतिहास का पूरा लेखा-जोखा उपलब्ध है किन्तु उसमें ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि जोधाबाई को कबी मरियम भी कहा गया था. यदि ऐसा कोई प्रमाणित सूत्र उपलब्ध हो तो मेरा भारत के प्रतिष्ठित इतिहासकारों से निवेदन है कि वे उसे प्रकाश में लायें.

मेरी दृष्टि में पुरातत्व सर्वेक्षण जैसा छल अकबर के मकबरे के बारे में कर रा है, मरियम के मकबरे में उससे कहीं अधिक घिनोना छल कर रहा है. भारत के तथाकथित इतिहासकार जीसस तथा मरियम को भारत के इतिहास के पात्र नहीं मानते, इसलिए सदा-सदा से जाने गए 'मरियम के मकबरे को जोधाबाई का मकबरा कहा जा रहा है. मैंने अपने इस संलेख के एक आलेख में जीसस और मरियम को अपने ऐतिहासिक पात्र कहा है, और यह मकबरा मेरे इतिहास की पुष्टि करता है. इसके समर्थन में अनेक तर्क उपस्थित हैं जिनकी चर्चा यहाँ की जा रही है.

अकबर के मकबरे के सामने सड़क के दूसरी ओर का विशाल क्षेत्र इसाई समुदाय की संपत्ति है, जिसपर एक चर्च, एक स्कूल तथा अनेक आवास बने हैं. इन्ही के मध्य उक्त मरियम का मकबरा है. भारत में जहाँ कहीं भी प्राचीन भवनों एवं स्थलों पर मुग़ल शासन काल में इस्लामी तख्तियां लगाई गयीं, उन सब को मुस्लिमों के अधिकार में दे दिया गया था, फलस्वरूप, तःमहल प्रांगण के अनेक भवन, फतहपुर सीकरी के भवन, तथा आगरा के अनेक ऐतिहासिक भवनों पर मुसलामानों का अधिकार है. अकबर के तथाकथित मकबरे पर भी मुस्लिम अधिकार बना हुआ है. इस सबके रहते हुए भी मरियम के मकबरे पर कोई मुस्लिम अधिकार नहीं है और इसके ईसाई संपत्ति के मद्य होने से सिद्ध होता है कि यह मकबरा किसी ऐसी स्त्री का है जिसका सम्बन्ध ईसाई धर्म से है. इस कारण से मुग़ल साम्राज्य काल में भी इसे इस्लाम से सम्बंधित नहीं कहा गया और इस पर अधिकार नहीं किया गया. इससे स्पष्ट है कि यह मकबरा जोधाबाई का न होकर जीसस की बहिन मरियम का है.

मरियम के मकबरे का आतंरिक अभिकल्प (ऊपर का चित्र) अन्य किसी भी मकबरे से भिन्न है और यह पशिमी बंगाल में स्थित विष्णुपुर में बने प्राचीन कालीन महलों (नीचे का चित्र) से मेल खाता है. मेरे द्वारा भारत के शोधित इतिहास में महाभारत युद्ध के पश्चात जब देवों की संख्या क्षीण हो गयी थी तब विष्णु (लक्ष्मण) ने मरियम से विवाह किया था जिसने चन्द्रगुप्त को जन्म दिया था. इस युद्ध में पांडव पक्ष का  नीतिकार कृष्ण था और कौरव पक्ष के नीतिकार शकुनी के छद्म रूप में स्वयं विष्णु थे. महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण और सिकंदर के आग्रह पर महा पद्मानंद को भारत का सम्राट बनाया गया था.

महाभारत की पराजय का बदला लेने के लिए विष्णु ने अपना नाम विष्णुगुप्त चाणक्य रखा और जीसस ने अपना नाम चित्रगुप्त रखा और भारत को महा पद्मानंद के शासन से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया जिसमें वे सफल रहे और चन्द्रगुप्त को भारत का सम्राट बनाया गया. यहीं से गुप्त वंश के शासन का आरम्भ हुआ और भारत विश्व प्रसिद्द 'सोने की चिडिया' कहलाया.

अतः उक्त मकबरा वास्तविक मरियम का ही मकबरा है, जो जीसस की बहिन, विष्णु की पत्नी, एवं चन्द्र गुप्त की माँ थीं. लक्ष्मी, दुर्गा एवं काली इनके अन्य रूप थे जिनकी चर्चा प्रसंगानुसार की जायेगी.      

मंगलवार, 16 मार्च 2010

राजनीति में शैक्षिक योग्यता का विरोध

उत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्य मंत्री महोदया ने अभी कुछ दिन पूर्व एक घोषणा की थी कि प्रदेश के आगामी ग्राम प्रधान चुनावों में कक्षा १० उत्तीर्ण व्यक्ति ही प्रधान पड के प्रत्याशी बन सकेंगे. साथ ही ग्राम पंचायत सदस्यता के प्रत्याशियों के लिए कक्षा ८ उत्तीर्ण होना अनिवार्य होगा. यह एक साहसिक कदम था जो भारत की राजनीति में शिक्षा के प्रवेश से शोधन का शुभारम्भ होता. किन्तु भारत के प्रबुद्धजन इस घोषणा से उत्पन्न आश्चर्य और प्रसन्नता को आत्मसात भी नहीं कर पाए थे कि अगले ही दिन उद्घोषणा द्वारा उक्त शक्षिक अनिवार्यता को रद्द कर दिया गया. जिससे यह स्पश हो गया कि भारतीय राजनीति में शक्षा का कोई महत्व नहीं है.

उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर ज्ञात हुआ है कि उक्त घोषणा का रद्द किया जाना मुख्य मंत्री महोदया के समर्थकों के आग्रह पर हुआ जो विधान सभा के सदस्य हैं और अनेक निरक्षर हैं. यहाँ यह भी बतादूँ कि मेरे गाँव खंदोई के प्रधान, मेरे विकास खंड ऊंचागांव के प्रमुख, तथा बुलंदशहर से मेरे संसद सदस्य सभी निरक्षर हैं, जो भारतीय राजनीति का प्रतिबिम्ब है. इससे मैं अतीव शर्मसार हूँ. मुख्य मंत्री महोदया की इस विषयक प्रथम घोषणा से मैं अत्यधिक प्रसन्न हुआ था.

ग्राम प्रधान भारतील शासन व्यवस्था का नीचे से प्रथम स्तर का संवैधानिक पड है इसके लिए शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता का दूरगामी परिणाम यह होता कि एक न एक दिन उच्चतम स्तर तक के सभी राजनैतिक पदों के लिए शैक्षिक याग्यता अनिवार्य कर दी जाती जिससे भारत की राजनीति में गुणात्मक सुधार होना सुनिश्चित था. किन्तु इसके आरम्भ पर ही कुठाराघात कर दिया गया ताकि देश निरक्षरों के शासन में ही पिसता रहे.   

अवतार और लेखक

हिंदी भाषा का दुर्भाग्य है कि इसमें सभी भावों के लिए प्रथक शब्दों का विकास नहीं किया गया है, जबकि भाषा के आदि पुरुषों ने वैदिक संस्कृत में शब्द विकास के अभूतपूर्व प्रयास किये थे. आधुनिक संस्कृत में वैदिक शब्दों के अर्थ विकृत किये जाने और हिंदी विकास का आधार आधुनिक संस्कृत होने के कारण हिंदी उन शब्दों का भी समावेश नहीं किया जा सका जो हमारे आदि पुरुषों ने हमारे लिए विकसित किये थे.

हिंदी के शब्द 'लेखक' का अर्थ 'लिखने का कार्य करने वाला व्यक्ति है, हो इस प्रकार के सभी व्यक्तियों के लिए उपयोग किया जाता है, जबकि यह कार्य दो भिन्न प्रकारों का होता है और दोनों में बहुत गंभीर अंतर होता है. प्रकृति के अध्ययन, वैज्ञानिक शोधों एवं प्रयोगों, गहन चिंतन, आदि के माध्यम से विकसित ज्ञान को वर्तमान और भावी पीढ़ियों हेतु लिखना एक दुष्कर प्रक्रिया है जो विरले ही कर सकते हैं. दूसरे प्रकार का लेखन कार्य उपलब्ध ज्ञान को अपने शब्दों में लिखना होता है. किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बोले गए शब्दों को लिखने वाले व्यक्ति को भी हिंदी में लेखक ही कहा जाता है.

वैदिक संस्कृत में शोधित एवं विकसित किये गए ज्ञान के अंकन करने वाले व्यक्ति को 'अवतार' कहा गया है, जिसका अर्थ आधुनिक संस्कृत में विकृत कर दिया गया और शब्द हिंदी में उपयोग किये जाने से वंचित हो गया. दूसरी ओर ज्ञानपरक लेखन करने वाले व्यक्ति के लिए उपयुक्त शब्द का अभाव उत्पन्न हो गया.इस आलेख में हम हिंदी के विस्तार एवं इस विषय पर लेखन की सुविधा के लिए अवतार शब्द का वही अर्थ लेंगे जो वैदिक संस्कृत में था, अर्थात 'ज्ञानपरक लेखक'.

समस्त मनाब जाति लेखन कार्य करने में सरलता से सक्षम हो सकती है किन्तु उसे अवतरण कार्य में सक्षम करना लगभग असंभव ही है. अवतरण कार्य केवल 'महामानव' ही कर सकते हैं. दूसरे शब्दों में अवतरण कार्य करने वाले ही महामानव बनाने की संभावना रखते हैं. इसके लिए उन्हें लेखन के विषय पर गहन अध्ययन, चिंतन एवं मनन करना होता है जिसका कष्ट सभी व्यक्ति नहीं करते क्योंकि मानव जाति स्वभावतः 'सुविधावादी' है. महामानव सुविधावादी न होकर संकल्प्वादी उत्प्रेरक होता है और वही मानव जाति को आगे ले जाने की सक्षमता रखता है. 

आतुर

What Do Authors Do?शास्त्रीय उपयोग में लिया गया शब्द 'आतुर' लैटिन भाषा के शब्द 'autor' से उद्भूत है जिसका अर्थ 'अधिकृत ज्ञान के आधार पर लेखन कार्य करने वाला व्यक्ति' है जिसे हिंदी में सामान्यतः 'लेखक' कहा जाता है, किन्तु किसी भी प्रकार का लेखन कार्य करने वाले व्यक्ति को भी लेखक कहा जा सकता है. वस्तुतः हिंदी में 'अधिकृत ज्ञान के आधार पर लेखन करने वाले व्यक्ति को 'आतुर' कहा जाना चाहिए. अतः शास्त्रों में जिन व्यक्तियों को आतुर कहा गया है, वे सभी उच्च कोटि के लेखक थे.
लैटिन के शब्द 'औटर' से ही आधुनिक अंग्रेज़ी शब्द 'author' बना है जिसका अर्थ 'writer' से भिन्न होता है.

चर, चरित, चरित्र

Soldier of Loveभारतीयों वेदों और शास्त्रों में उपयुक्त शब्द चर, चरित और चरित्र परस्पर सम्बंधित हैं और लैटिन भाषा के शब्दों cars, caritas, से उद्भूत हैं जिनके अर्थ क्रमशः .'प्रिय' एवं 'प्रेम' हैं. इन्ही से फ्रांसीसी भाषा का शब्द चरित्रे बना है जिसका अर्थ 'परोपकार' है जो प्रेम से ही उत्पन्न होता है. अतः शास्त्रीय शब्द चर का अर्थ 'प्रिय', तथा चरित का अर्थ 'प्रेम' हैं. चरित्र शब्द क्रिया शब्द है जिसका अर्थ 'प्रेम करना' है.

रविवार, 14 मार्च 2010

अकबर के मकबरे का छल

आगरा से लगभग ८ किलीमीटर की दूरी पर एक ऐतिहासिक स्थल है 'सिकन्दरा', जहां एक विशाल प्रांगण में अति भव्य भवन स्थित है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसे अकबर के मकबरे के नाम से प्रचारित किया जाता रहा है. इस के केन्द्रीय भवन में एक कब्र बनी है जिसपर तैनात एक मुस्लिम अपनी चन्दा वसूली करता रहता है. इसी भवन के एक बरामदे में दो कब्रें और बनी हैं जिन्हें अलबर की पुत्रियों की कब्रे कहा जाता है. इसी भवन के चारों ओर भव्य बरामदे हैंजिनकी भूमि खोखली है अर्थात नीचे भी कक्ष बने हैं. यह खोखलापन पदचापों की प्रतिध्वनियों से स्पष्ट हो जाता है. 

इस प्रांगन का मुख्य द्वार स्वस्तिक चिन्हों से सुशोभित है और अनेक सह-भवनों के पत्थरों पर अनेक पशु, पक्षी, वस्तु आदि के चित्र अंकित हैं. मैं लगभग पांच वर्ष पूर्व वहाँ गया था और समस्त प्रांगण की भव्यता एवं चित्रकारी से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इस का सम्बन्ध किसी मुस्लिम से है, विशेषकर सर्वाधिक विलासी अकबर से. मैंने इस बारे में वहा तैनात पुरातत्व अधिकारी से बातचीत की.
 
मेरा पहला प्रश्न था कि अकबर का मकबरा किसने बनवाया, उसका पुत्र तो ऐसा कार्य कर नहीं सकता क्योंकि उसने तो अकबर से विद्रोह कर सत्ता हथियाती थी. इसका उत्तर जो मुझे दिया गया वह आश्चर्य काकित करने वाला है. उत्तर था - 'अकबर ने अपनी मृत्यु से पूर्व अपने लिए यह मकबरा बनवाया था.

मेरा दूसरा प्रश्न था कि एक कट्टर मुस्लिम के मकबरे पर स्वस्तिक चिन्ह और जीवों के चित्रों के अंकन का क्या रहस्य है? इसका उत्तर मिला कि अकबर सभी धर्मों का सम्मान करता था. इस पर मैंने पूछा कि इस सम्पूर्ण प्रांगण में मुझे कोई मुस्लिम प्रतीक दिखाइए, और मुझे इसका लोई उत्तर नहीं दिया गया. वस्तुतः संपूर्ण प्रांगण में कोई इस्लामिक चिन्ह उपस्थित नहीं है.

मेरा तीसरा प्रश्न था कि ज्ञात इतिहास के अनुसार अकबर निःसंतान था और किसी सूफी की कृपादृष्टि से ही उसकी पत्नी के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ था. (वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसी कतिप का अर्थ मैथुन क्रिया ही होता है, जो अकबर के विरुद्ध विद्रोह का भी कारण हो सकता है.) अतः अकबर की कोई पुत्री थी ही नहीं पुत्रियों की कब्र कैसे बन गयीं. उपस्थित अधिकारी के पास इसका भी कोई उत्तर नहीं था.

इस सब का अर्थ यही है कि उक्त भवन अकबर का मकबरा नहीं है और न ही इसे भारत पर मुस्लिम शासन की अवधि में निर्मित किया गया. स्वस्तिक चिन्ह इसे देव जाति द्वारा निर्मित भवन सिद्ध करता है. राम की पत्नी का वास्तविक नाम 'स्वस्तिका' था  इसी आधार पर स्वस्तिक शब्द का अर्थ 'स्वास्थ' लिया जाता है क्योंकि उनके मुख लेखन स्वास्थ संबंधी है. देवों द्वारा भारत के विकास के समय लिखे गए अधिकाँश शास्त्र स्त्रियों द्वारा ही लिखे गए थे. अतः उक्त भवन राम की पत्नी स्वस्तिका का स्मारक है. इसी का एक अन्य प्रमाण इसी संलेख पर अगले आलेख में पढ़िए. .  

क्लिष्ट, क्लिष्टाक्लिष्टा

क्लिष्ट 
वेदों और शास्त्रों में 'क्लिष्ट' शब्द ग्रीक भाषा के शब्द 'kleistos' से लिया गया है जिसका अर्थ 'बंद' है. आधुनिक संस्कृत में इसका अर्थ 'कठिन' है जो वेदों और शास्त्रों के हिंदी अनुवादों में उपयोग करना गलत है.

क्लिष्टाक्लिष्टा 
पतंजलि योगसूत्र तथा संभवतः अन्य शास्त्रों में उपस्थित यह शब्द तत्कालीन भाषा विज्ञानं का शिक्षाप्रद  उदहारण है. क्लिष्ट शब्द के मौलिक अर्थ के अनुसार 'क्लिष्टाक्लिष्टा' का अर्थ 'बंद के अंतर्गत बंद' अर्थात 'परत दर परत बंद' है जो वानस्पतिक सन्दर्भों में 'बंद-गोभी' के लिए है. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वह समय भाषाओँ के उदय का समय था और प्रत्येक वस्तु के लिए प्रथक शब्द विकसित नहीं हुए थे, अतः वस्तुओं को उनके विशिष्ट गुणों के माध्यम से व्यक्त किया गया.      

शनिवार, 13 मार्च 2010

महिला आरक्षण का षड्यंत्र

 महिलाओं के लिए विधायिकाओं में एक तिहाई स्थान प्रदान करने वाला आरक्षण बिल राज्यसभा में पारित हो गया, जो प्रत्यक्ष अनुभवों से कुछ भी न सीखने का सटीक उदाहरण है. पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण पहले से ही लागू है और इसके परिणाम घोर निराशाजनक सिद्ध हुए हैं.

मेरे गाँव के प्रधान एक निरक्षर महिला है और ऐसी ही एक महिला विकास खंड की प्रमुख है. मैं गाँव में ही रहता हूँ किन्तु मैंने कभी ग्राम प्रधान को कभी नहीं देखा क्योंकि वह घूँघट में रहती है. उसका निरक्षर एवं शराबी पति ही प्रधान की भूमिका का निर्वाह करता है. ग्रामवासियों को शराब पिलाकर ही उसने यह पड प्राप्त किया था जो भारत में जनतंत्र की वास्तविक स्थिति है. अन्य प्रत्याशी कुछ साक्षर थे और सौम्य भी, वे इस सीमा तक नहीं गिर सके और चुनाव में पराजित हो गए.

विकास खंड कार्यालय में भी मुझे यदा-कदा जाना होता है, किन्तु मैंने कभी भी वहां प्रमुख महोदया को नहीं पाया, उसके लिए निर्धारित कुर्सी पर उसके पति ही विराजमान पाए जाते हैं. उन्होंने चुनाव में विजय के लिए प्रत्येक सदस्य को एक-एक लाख रुपये दिए थे और उन्हें लगभग १५ दिन ऋषिकेश के एक आश्रम में कैद करके रखा था.

ये महिला आरक्षण के व्यवहारिक पक्ष हैं और ऐसा ही कुछ विधायिकाओं में होगा. वहाँ सदस्य महिलाओं के पति उपस्थित तो संभवतः न हों किन्तु सडन के बाहर के सभी कार्य उनके पति ही करेंगे. ऐसे अनुभवों और संभावनाओं पर भी महिला आरक्षण पर बल दिया जा रहा है, इसका कुछ विशेष कारण तो होगा ही. आइये झांकें इसके यथार्थ में.

यह सर्वविदित है कि भारत के राजनेताओं की सपरिवार सत्ता में बने रहने की भूख अमिट और असीमित है  अनेक परिवारों के कई-कई सदस्य विधायिकाओं में विराजमान देखे जा सकते हैं. इस पर भी ये सुनिश्चित करना चाहते हैं कि विधायिकाओं में उनके परिवारों के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति प्रवेश न कर पाए, क्योंकि जितने अधिक परिवार वहाँ होंगे, राजनेताओं के कुत्सित व्यवसायों की सफलताओं में उतनी ही अधिक अनिश्चितता आयेगी. इनमें वे और केवल उनके परिवार ही उपस्थित रहें, महिला आरक्षण इसमें उनकी सहायता करेगा. 

भारत के लगभग सभी राजनैतिक दल राजनेताओं की जागीरें हैं जहाँ उनके एक छात्र शासन चलते हैं. विधायिकाओं में प्रवेश के टिकेट इन्हीं जागीरों से निर्धारित किये जाते हैं. महिलाओं के लिए आरक्षण न होने से अनेक बाहरी व्यक्ति भी इन जागीरदारों से अनुनय-विनय करके विदयिकाओं में प्रवेश पाने के प्रयास करते हैं. विधायिकाओं में महिला आरक्षण से पति-पत्नी दोनों ही चुने जाने के प्राकृत रूप से अधिकारी हो जायेंगे, अथवा प्रवेश टिकेट ऐसी अन्य मेलों को दिए जायेंगे जो पत्नी न होकर परनी-समतुल्य भूमिका का निर्वाह करने को तत्पर हों. इससे राज्नाताओं के सुविधा-संपन्न जीवन और अधिक सुविधा-संपन्न बन सकेंगे. 

मानव भाव अभिव्यक्ति

मनुष्यता की दो पहचानें मानवता को पशुता से प्रथक करती हैं - समाजीकरण एवं भाषा विकास. समाजीकरण का मूल मन्त्र कार्य विभाजन के साथ परस्पर सहयोग है, जबकि भाषा विकास का मूल भाव और शब्द का सम्बन्ध है. इन्ही दो माध्यमों से मानव समाज से महामानावोदय की संभावना है. सहयोग की चर्चा इस संलेख पर की जा चुकी है,  यहाँ प्रस्तुत है भाव और शब्द संबंधों की समीक्षा.

अभी कुछ दिन पूर्व एक आर्य समाज अनुयायी से मिलाना हुआ और उन्होंने मुझे बताया कि आर्य समाज की दृष्टि में विदों की ऋचाएं बनाने के बाद ऋषियों ने उनके अर्थ बनाये जिसके कारण ऋषि उन ऋचाओं के दृष्टा कहलाए. यह तो मैं निश्चित रूप में नहीं कह सकता कि यह आर्य समाज का अधिकृत दृष्टिकोण है किन्तु इतना अवश्य कह सकता हूँ कि इससे अधिक मूर्खतापूर्ण दृष्टिकोण किसी लेखन के बारे में मुझे अभी तक दृष्टिगोचर नहीं हुआ है. शब्द कदापि अपने भाव से पूर्व अस्तित्व आ ही नहीं सकता.

भाषा विकास और उपयोग की यात्रा में सबसे पहले कोई भाव उदित होता है तदुपरांत उस भाव को व्यक्त करने हेतु शब्दों की रचना की जाती है. यही प्रक्रिया प्रत्येक भाषा की संदाचना में अपनाई जाती है और यही विकसित भाषा के उपयोग में लेखन प्रक्रिया में.

आधुनिक काल में भाषा और लिपि को प्रथक-प्रथक माना जाता है किन्तु जिस समय मानवों ने अपने उपयोग हेतु भाषा विकास आरम्भ किये उस समय इन दोनों को प्रथक नहीं माना जाता था, प्रत्येक भाषा की एक निर्धारित लिपि होती टी और उसे भी भाषा के अंग के रूप में ही जाना जाता था. इस कारण उस काल में लिपि शब्द का उद्भव नहीं हुआ था. उदाहरण के लिए भारत इतिहास के आरंभिक काल में देवनागरी को ही भाषा कहा जाता था जिसमें लिपि, शब्द, और व्याकरण अंगों के रूप में सम्मिलित किये गए. उस काल की देवनागरी भाषा को आज वैदिक संस्कृत कहा जाता है. वस्तुतः 'लिपि' शब्द की आवश्यकता उस समय हुई जब एक ही लिपि के उपयोग से भावों को व्यक्त करने हेतु अनेक भाषाओँ का विकास हुआ. वैदिक संस्कृत, आधुनिक संस्कृत और हिंदी तीनों भाषाएँ देवनागरी लिपि पर आधारित हैं. इन तीन भाषाओँ में शब्दार्थ एवं व्याकरण नियम भिन्न हैं. वर्तमान अध्ययन में हम लिपि को भाषा से प्रथक नहीं मान रहे हैं, अर्थात लिपि, शब्द और व्याकरण तीनों को हम भाषा के अंग ही कहेंगे. इसलिए 'लिपि' शब्द की हमें आगे आवश्यकता नहीं होगी.

भाषा विकास में सबसे पहले अक्षर अर्थात ध्वनियों की अभिव्यक्तियों के लिए लिखित प्रतीक चुने जाते हैं, जिनके संग्रह को वर्णमाला कहा जाता है. इसके बाद उदित प्रत्येक अर्थ के लिए एक शब्द चुना जाता है और इन दोनों के समन्वय को शब्दार्थ कहा जाता है. शब्दों के सार्थक समूह को वाक्य कहते हैं जिनकी संरचना के नियमों को व्याकरण कहा जाता है. इसके बाद उदित भावों को अभिव्यक्त करने हेतु वाक्यों की रचना की जाती है. इस प्रकार प्रत्येक भाषा के तीन अंग होते हैं - वर्णमाला, शब्दार्थ और व्याकरण. अक्षर, शब्द और वाक्य अभिव्यक्तियों के केवल प्रतीक होते हैं, मूल अभिव्यक्ति नहीं. इनकी मूल अभिव्यक्तियाँ क्रमशः ध्वनि, अर्थ और भाव होते हैं.

मस्तिष्क में सबसे पहले कोई भाव उदित होता है, उसे अभिव्यक्त करने हेतु अर्थ चुने जाते हैं. प्रत्येक अर्थ के लिए एक शब्द चुना जाता है. प्रत्येक शब्द ध्वनियों का सार्थक समूह होता है तथा प्रत्येक ध्वनि की अभिव्यक्ति हेतु अक्षर चुना जाता है. इस प्रकार अक्षरों के सार्थक समूहन से शब्द बनाते हैं और शब्दों के सार्थक समूहन से वाक्य बनते हैं.

यद्यपि भाव अभिव्यक्ति मानवीय कर्म है किन्तु यह इतना महत्वपूर्ण है कि जीव जगत में यह ही मानवता की विशिष्ट पहचान है. अर्थात समस्त जीव जगत में केवल मानव ही अपने भावों की लिखित अभिव्यक्ति से संपन्न हैं. महामानवता को इससे भी आगे जाना होगा किन्तु यह तभी संभव होगा जब कोई मानव पूरी तरह इस प्रक्रिया से आत्मसात होगा. यही महामानवता का सोपान है.    .     

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

मानव संसाधन विकास एवं उपयोग

बौद्दिक जनतंत्र मानव संसाधन विकास को ही अपना उत्तरदायित्व  नहीं मानता अपितु इसके सम्यक उपयोग के लिए भी तत्पर है. जबकि वर्त्तमान भारतीय जनतंत्र जनसँख्या वृद्धि कहकर उपयोग से आँखें मूंदे हुए है. प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति अपने उप्ब्जोग से अधिक सम्पदा का उत्पादन कर सकता है इसलिए राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था जनसँख्या के उपयोग पर निर्भर होती है.

स्वास्थ एवं शिक्षा 
राज्य का प्रथम कर्तव्य सभी नागरिकों को शारीरिक और मानसिकरूप रूप से स्वस्थ बनाये रखना है. इसके लिए निम्नांकित बिंदु विशेष महत्वपूर्ण माने गए हैं -
  1. प्रत्येक युगल स्वस्थ एवं सुशिक्षित होगा तथा वे दोनों सुदूर परिवारों में जन्मे होंगे. प्रत्येक परिवार के पास सम्मानपूर्वक जीवनयापन हेतु आय के साधन होंगे.परिवार का कोई भी सदस्य किसी प्रकार के नशीले द्रव्य का सेवन नहीं करेगा. 
  2. प्रत्येक गर्भवती के स्वास्थ की रक्षा संतुलित पोषण एवं चिकित्सीय सुविधाओं द्वारा सुनिश्चित होगी तथा किसी भी स्त्री को तीन से अधिक बच्चों को जन्म देने की अनुमति नहीं होगी जिनमें से दो जन्मों का अंतराल न्यूनतन तीन वर्ष होगा, 
  3. प्रत्येक युगल द्वारा अपने बच्चे के स्वास्थ एवं सम्पूर्ण विकास हेतु २५ वर्ष की आयु तक पोषण, शिक्षा एवं संस्कारण की व्यवस्था सुनिश्चित की जायेगी और उनमें किसी भी प्रकार से हीनता की भावना विकसित नहीं होने दी जायेगी. 
  4. युवाओं को अध्यात्म, भाग्य, ज्योतिष, जन्म-जन्मान्तर, निष्काम कर्म, ईश्वरीय कृपा, अपमान और स्वाभिमान के हनन पर भी  सहिष्णु बने रहने जैसे विनाशकारी सन्दर्भों से बचाकर रखा जाएगा ताकि वह एक आत्मविश्वास से भरा सक्र्तीय बुद्धिवादी नागरिक बन सके.    
इन सब के लिए बौद्धिक जनतंत्र व्यक्तिगत स्तर पर पूर्ण स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर पूर्ण अनुशासन लागू करते हुए समुचित एवं सभी के लिए एक समान शिक्षा पाने के अवसर, सभी को एक समान स्वस्थ सेवाएँ, तथा सभी के लिए त्वरित न्याय प्रद्दन करने के लिए कटिबद्ध है.

आय के साधन
प्रत्येक युवा को उसकी शिक्षा, रूचि और सक्षमता के आधार पर उसके सामान्य निवास के निकट ही समुचित आय के अवसर व्यवस्थित किये जायेंगे जिसके लिए केवल शहरीकरण पर जोर न दिया जाकर देश के प्रत्येक क्षेत्र का संतुलित आर्थिक विकास किया जाएगा. इसके लिए केवल चाकरी प्रदान करने की व्यवस्था न की जाकर उसे व्यवसाय, कला एवं दस्तकारी, कृषि, कुत्टर उद्योग खाद्य संस्कारण उद्योग, वैज्ञानिक एवं प्रोद्योगिकी संबंधी व्यवसाय, साहित्यिक एवं वैज्ञानिक लेखन आदि के अवसर उसी के निवास के समीप विकसित किये जायेंगे.

इसके लिए राष्ट्र में अब भी पर्याप्त संसाधन एवं संपदाएं हैं जो समाज को श्रेष्ठ और क्षुद्र भागों में विभाजित कर केवल अल्पसंख्यक श्रेष्ठ लोगों के हाथों में दे दिए गए हैं.यह अंध शहरीकरण किया जाकर सभी अवसर एवं सुविधाएँ केवल शहरों में प्रदान की जा रही हैं. बहुल जनसँख्या जो गांवों में निवास करती है सुख-सुविधाओं एवं आय के साधनों के लिए तरती छोड़ दी गयी है.  .    

गुरुवार, 11 मार्च 2010

अज्ञानता और अचिंतन का अन्धकार

ईश्वर, धर्म, अद्यात्म, आदि, यदि हम इन शब्दों को वर्तमान में प्रचलित अर्थों में लें, मानवता में अचिंतन के सूत्रपात सिद्ध होते हैं. ये सभी शब्द भारत के प्राचीन वेदों और शास्त्रों में पाए जाते हैं किन्तु वहाँ इनके अर्थ वर्तमान में प्रचलित अर्थों से भिन्न हैं. इन शब्दों के नए अर्थ जानबूझकर भिन्न किये गए ताकि ज्ञान के अकूत भण्डार इन देव ग्रंथों के ज्ञान को सदा सदा के लिए लुप्त कर दिया जाये और लोग इनमें उन विकृत भावों को ही देख पायें जो शब्दार्थ परिवर्तन से इन पर थोपे गए हैं. इससे तीन लाभ हुए -
  1. वेदों और शास्त्रों का वास्तविक ज्ञान लुप्त हो गया, 
  2. वेदों और शास्त्रों की प्रमाणिकता का दुरूपयोग कर षड्यंत्रकारियों ने अपना भ्रम फ़ैलाने का लक्ष्य प्राप्त किया.
  3. निरक्षर षड्यंत्रकारियों को अपने मंतव्य हेतु कोई नया ग्रन्थ नहीं लिखना पड़ा. परिणामस्वरूप, देवों के विज्ञानं और इतिहासपरक ग्रन्थ - वेद और शास्त्र, धर्म ग्रन्थ मने जाने लगे.        
इसी आधार पर श्रीमद भगवद्गीता में जन समुदाय को दो वर्गों में दर्शाया गया है - धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे, अर्थात धर्मावलम्बी और कर्मावलम्बी. इसी से सिद्ध होता है कि धर्म और कर्म परस्पर विरोधी धारणाएं हैं. धर्म का आडम्बर चाहे जितना भी किया गया हो, कर्म के महत्व को कभी कम नहीं किया जा सका. इससे लोगों में असमंजस उत्पन्न हुआ कि वे धर्म को अपनाएं या कर्म को. अपने परिश्रम के बल पर आजीविका चलाने और मानव सभ्यता का विकास करने के पक्षधरों ने कर्म का मार्ग अपनाया तो समाज को ब्रमित कर उसे अज्ञानता के अचिंतन में निमग्न करते हुए उस पर मनोवैज्ञानिक हनन के माध्यम से राजनैतिक शासन करने वालों ने धर्म को अपनाया. यहीं से आरम्भ हुआ मानवता के संगठित शोषण का इतिहास.

आज का भारतीय समाज तीन वर्गों में विभाजित देखा जा सकता है - नगण्य कर्मावलम्बी, संगठित धर्मावलम्बी और असंख्य अज्ञान और अचिंतन के अन्धकार से भ्रमित जनसाधारण. कर्मावलम्बी परिश्रम करते हैं और अपनी बुद्धि का सदुपयोग करते हुए मानवीय गुणों का विकास करते हैं, धर्मावलम्बी संगठित रूप में तीसरे वर्ग का शोषण करते हुए वैभव भोगते हैं और अपनी बुद्धि का दुरूपयोग करते हुए समाज को भ्रमित एवं ईश्वर के नाम से आतंकित करने एवं रखने हेतु नए नए मार्ग खोजते हैं. तीसरा वर्ग वस्तुतः शोषित है और असमंजस में है, वह कर्म करता है अपनी आजीविका हेतु किनता इससे प्राप्तियों का बहुलांश संगठित धर्मावलम्बी हड़प लेते हैं  आजीविका के संकट से तृस्त यह वर्ग आतंकित भी है और अचिंतन के अन्धकार में निमग्न भी. चूंकि यह समाज का बहुत बड़ा अंश है, इसलिए इसी की स्थिति को समाज की सामान्य स्थिति माना जा सकता है.

समाज का शोषित तीसरा अंश पूरी तरह निर्धन नहीं है, इसमें अनेक धनवान भी सम्मिलित हैं किन्तु ये बौद्धिक कंगाल हैं क्योंकि ये तो यह भी नहीं जानते कि कितना कमाएं और किसलिए. कमाई की अनंत यात्रा पर बस चलते रहते हैं - धनवान होते हुए भी अनंत धन-सम्पदा की कामना लिए हुए अपनी कमाई कोई सदुपयोग भी नहीं कर पाते. संगठित धर्मावलम्बी इन्ही की अज्ञानता, अचिंतन और सम्पन्नता का शोषण करते हुए वैभवपूर्ण जीवन जीते हैं.           

बुधवार, 10 मार्च 2010

शक्कर की कड़वाहट

विगत २ वर्षों में केंद्र सरकार में पदासीन राजनेताओं के निहित स्वार्थों और कुप्रबंधन के कारण शक्कर के उपभोक्ता मूल्य में सतत वृद्धि होती रही है और लगभग २० रुपये से ४० रुपये प्रति किलोग्राम हो गयी है. यह शक्कर उस गन्ने से बनी थी जिसका किसानों को दिया गया मूल्य लगभग १०० रुपये प्रति कुंतल था. शक्कर की अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि से पीड़ित किसानों ने भी इस वर्ष अपने गन्ने के मूल्य बढ़ने की मांग की. सरकार ने इसके मूल्य भी २५० रुपये प्रति कुंतल कर दिए टाटा निजी शक्कर मिल किसानों को गन्ने का मूल्य लगभग ३०० रुपये दे रहे अं. जब इस गन्ने से बनी शक्कर बाज़ार में आयेगी तो उसका मूल्य तार्किक दृष्टि से १०० रुपये प्रति किलोग्राम होना चाहिए.

वर्तमान का शक्कर मूल्य लगभग ४० रुपये प्रति किलोग्राम जनसाधारण की जेबों को भारी लग रहा है, इसमें और अधिक वृद्धि होने से देश में शक्कर की खपत में भारी गिरावट हो जायेगी जिससे शक्कर कारखानों को अपना उत्पाद विक्त्रय करने में कठिनाई होगी, हो सकता है कि उन्हें शक्कर का खुदरा मूल्य गिरना पड़े जिससे उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं राह पायेगी..

दूसरी ओर गन्ने के मूल्य लगभग ३ गुना वृद्धित होने से इस वर्ष किसानों ने बहुत अधिक गन्ना बोया है. जिससे अगले शक्कर चक्र में गन्ने का उत्पादन बहुत अधिक होगा. कारखानों की आर्थिक स्थिति बिगड़ने से वे किसानों का गन्ना अब निर्धारित मूल्य पर नहीं खरीद पाएंगे. हो सकता है कि किसानों का सकल उत्पाद विक्रय ही न हो पाए. जिस समय चौधरी चरण सिंह देश के प्रधान मंत्री थे उस समय ऐसी हे स्थिति उत्पन्न हो गयी थी और किसानों को अपनी गन्ने की फसल खेतों में ही जलानी पडी थी. अगले शक्कर चक्र में इसकी पुनरावृत्ति होने की बहुत अधिक संभावना है.

ऐसी स्थिति में सरकार को गन्ने के मूल्य को नियंत्रण मुक्त करना होगा ताकि कारखाने अपनी इच्छानुसार मूकी पर गन्ना खरीदें. इससे किसानों की आशाओं पर पानी फिर जायेगा. कारखानों के सामने एक विकल्प शक्कर का निर्यात है किन्तु इससे उन्हें शक्कर की वह कीमत नहीं मिल पायेगी जिसकी वे आशा किये बैठे हैं.

इस प्रकार अगला शक्कर चक्र गन्ना उत्पादकों और शक्कर कारखानों के लिए निराशाजनक होगा, जिसका पूरा पूरा दायित्व वर्तमान कृषि मंत्री और प्रधान मंत्री का होगा. ऐसी स्थिति उत्पन्न होने का मुख्य कारण यह है कि देश में उत्पादन का कोई नियोजन नहीं है. विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी स्थिति आती रही हैं किन्तु शासक-प्रशासक इनसे कोई सबक नहीं सीखते.

मंगलवार, 9 मार्च 2010

भाग्य, भजन, भगवान्, भगवती

लैटिन भाषा का एक शब्द है - phagein, जिसका अर्थ 'खाना' अथवा 'भोजन' है. इसे शब्द से उद्भूत हुए हैं शास्त्रीय शब्द 'भाग्य'.और 'भजन' जिनके देवनागरी अर्थ 'भोजन' हैं. साधारण अर्थों में भी भोजन ही मनुष्य का भाग्य होता है. वमानों ने लोगों को भ्रमित कर अपने छल-कपट भरे व्यवसाय चलने के लिए भाग्य को ज्योतिष से जोड़ा और भजन को ईश्वर से, और भोले-बाले लोगों के शोषण करते रहे.
'भाग्य' शब्द से बना है 'भगवान्' जिसका अर्थ 'भोजन का उत्पादक' अर्थात 'किसान' है. शास्त्रीय शब्द 'भगवती' भी 'भाग्य' से बना है जिसका अर्थ 'भोजन बनाने वाली स्त्री' होता है. परंपरागत रूप में पुरुष खेती करते थे और स्त्रियाँ परिवार के लिए भोजन बनाते थे. इसलिए किसान दंपत्ति को शास्त्रों में 'भगवन-भगवती' कहा गया है.  .    

महामानव का अनिवार्य लक्षण और लक्ष्य

तीन विशेषण शब्द - ठीक, सामान्य और साधारण, प्रायः एक दूसरे के पर्याय के रूप में उपयोग किये जाते हैं. इन के अंग्रेजी समतुल्य शब्द - normal , common और ordinary, भी लगभग पर्याय मने जाते हैं. किन्तु इन तीन शब्दों के विलोम शब्द - बेठीक  (abnormal), असामान्य (uncommon) और असाधारण (एक्स्ट्रा-ordinary), एक दूसरे के पर्याय न होकर बहुत अधिक भिन्न अर्थ रखते हैं. शब्दों के इस भेद में हमारे सीखने के लिए बहुत हुछ छिपा है.

प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ सामर्थवान है, स्वयं को उन दूसरों से भिन्न दर्शाना चाहता है जिन्हें वह ठीक, सामान्य तथा साधारण मानता है. इस चाह  में कभी वह बेठीक हो जाता है, कभी असामान्य तो कभी असाधारण, जबकि उसकी वास्तविक चाह 'असाधारण' होने की होती है. प्रत्येक महामानव न तो बस ठीक होता है, न सामान्य और न ही साधारण. इस प्रकार हम पाते हैं कि प्रत्येक सामर्थवान व्यक्ति महामानव होने की चाह रखता है तथा इसकी सक्षमता रखता है.

प्रचलित मान्यताओं के अनुसार किसी व्यक्ति के बेठीक, असामान्य अथवा असाधारण समझे जाने में उस व्यक्ति विशेष की भूमिका नगण्य होती है, किन्तु दूसरों के दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. एक समर्थवान व्यक्ति को उसके समाज के कुछ लोग बेठीक मानते हैं, कुछ अन्य उसे असामान्य वर्ग में रखते हैं तो कुछ उसे असाधारण समझते हैं. इस प्रकार ये तीन विशेषण लक्श्यपरक न होकर व्यक्तिपरक सिद्ध होते हैं चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि के अनुसार ही दूसरों का आकलन करता है. अतः प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि दूसरों से भिन्न होती है तथा वह इसकी परिभाषा भी दूसरों की परिभाषा से भिन्न रखता है. ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के बारे में दूसरों के आकलन महत्वहीन हो जाते हैं. यही जागतिक यथार्थ है.

उपरोक्त से सिद्ध होता है कि सामर्थवान व्यक्ति का अपने बारे में आकलन ही सर्वोपरि एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है जबकि बस-ठीक, सामान्य और साधारण व्यक्तियों के लिए दूसरों के आकलन महत्वपूर्ण होते हैं. यही अंतराल है - महामानव और मानव का. यहीं से आरम्भ होते हैं महामानव के विशिष्ट गुण - आत्मविश्वास, आत्मसम्मान, अत्म्संकल्प, और सर्वोपरि उसके द्वारा अपने लिए चुनी गयी राह. इस सबके लिए उसे दूसरों के उसके बारे में मतों और आकलनों से निरपेक्ष होना अनिवार्य हो जाता है जिसके लिए अदम्य साहस की आवश्यकता होती है. जो ऐसा साहस कर पाते हैं वही महामानव बनाने की संभावना रखते हैं. यहाँ यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि सभी अदम्य साहसी व्यक्ति महामानव नहीं बन सकते. अतः महामानाव्में उपरोक्त गुणों के अतिरिक्त एक अन्य विशेष गुण की भी आवश्यकता होती है.
 
प्रत्येक अपराधी भी साहसी होता है, अपने अपराध के बारे में दूसरों के आकलन से निरपेक्ष रहता है, और उसे बस-ठीक, सामान्य अथवा साधारण भी नहीं कहा जा सकता. तथापि वह महामानव का पूर्णतः विलोम होता है. तो फिर क्या है वह गुण जो महामानव को एक अपराधी से भिन्न बनाता है?  यह गुण है उसकी चिन्तनशीलता जो उसे अपराधी बनाने की अपेक्षा महामानावारा की ओर मोड़ती है. चिन्तनशीलता ही मनुष्यों को अन्य जीवों सी प्रथक करती है और यही मानुष-मनुष्य में अंतराल उत्पन्न करती है, और यही कुछ व्यक्तियों को महामानव बनाती है. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिपरक होने से बच नहीं सकता, किन्तु विभिन्न व्यक्तियों के लक्श्यपरक होने के परिमाण भिन्न होते हैं. इस प्रकार महामानव की चिन्तनशीलता व्यक्तिपरक होने के साथ-साथ उछ परिमाण की लक्श्यपरण होती है. 
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साधारण से साधारण व्यक्ति भी स्वयं को चिन्तनहीन स्वीकार नहीं करता क्योंकि सभी चिंतन करते हैं मनुष्य के मस्तिष्क के प्राकृत रूप में चिंतनशील होने के कारण. किन्तु विभिन्न व्यक्तियों के चिंतन विषय तथा उनके स्तर भिन्न होते हैं. इसमें व्यक्ति के सरोकारों का बहुत महत्व होता है - कुछ व्यक्तियों के सरोकार स्वयं के लिए रोटी, कपड़ा और मकान पाने तक सीमित होते हैं, कुछ वैभवपूर्ण जीवनशैली अपनाने को समर्पित होते हैं, तो कुछ असीमित संपदा संग्रह को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाते हैं. कुछ सामाजिक लोकप्रियता को ही अपना सर्वोपरि सरोकार बनाते हैं. किन्तु महामानव के सरोकार इन सबसे भिन्न होते हैं.

महामानव मानवता के शीर्ष के ओर अग्रसर होता है इसलिए उसका सर्वोपरि सरोकार ऐसे मानवीय गुणों का विकास होता है जिनसे मानव सभ्यता आगे जाती है. मानव सभ्यता विकास के बारे में भी मतान्तर हो सकते हैं, किन्तु इसका मानदंड केवल एक है जो मानव को अन्य जीवों से भिन्न बनाता है. सभी जंगली जीवों में सशक्त द्वारा निर्बलों का शोषण प्राकृत गुण के रूप में विद्यमान है, यही उनके अपने जीवन का आधार होता है. मनुष्य प्राकृत जीव नहीं राह गया है, इसने विकास किया है - परस्पर शोषण से विमुख होकर परस्पर सहयोग की भावना विकसित करके और इसके लिए समुचित व्यवस्थाएं करके. अतः शोषण-विहीन समाज की संरचना ही मानव सभ्यता के विकास की परिचायक है और यही प्रत्येक महामानव का लक्ष्य होता है.

सोमवार, 8 मार्च 2010

धर्म और उसका स्थान

बौद्धिक जनतंत्र की सुनिश्चित मान्यता है कि दर्मों और सम्प्रदायों ने मानव समाज कोविभाजित कर घोर अहित हिय है तथापि यह प्रत्येक व्यक्ति को आस्था की स्वतन्त्रता का सम्मान करता है किन्तु इसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति एवं प्रदर्शन की स्वतन्त्रता प्रदान नहीं करता. बौद्धिक जनतंत्र की मान्यता है कि धर्म, संप्रदाय आदि में आस्था पूर्णतः व्यक्तिगत प्रश्न हैं और इसे व्यक्तिगत स्तर तक ही सीमित रखना समाज के हित में है.

धार्मिक आस्था का वास्तविक स्थान व्यक्ति का मन होता है, यह बाह्य प्रदर्शन का विषय नहीं होता. अतः बौद्धिक जनतंत्र नागरिकों को अपनी आस्थाओं को स्वयं तक ही सीमित रखने का प्रावधान करता है जिसके लिए सार्वजानिक रूप से धार्मिक आस्था का प्रदर्शन पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है. इस प्रावधान के अंतर्गत नागरिकों के व्यक्तिगत आवासों के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर किसी धार्मिक स्थल अथवा भवन - जैसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, आदि के निर्माण अथवा रख-रखाव की अनुमति नहीं होगी. बौद्धिक जनतंत्र व्यवस्था लागू होने के पूर्व जो भी धार्मिक स्थल अथवा भवन विद्यमान होंगे उन्हें सार्वजनिक विद्यालयों, स्वास्थ केन्द्रों, सभा भवनों आदि में परिवर्तित कर दिया जायेगा तथा उनपर व्यक्तिगत अथवा वर्ग विशेष के अधिकार समाप्त कर दिए जायेंगे.

इन प्रावधानों की पृष्ठभूमि में मानवता का इतिहास है जिससे स्पष्ट है कि धर्म, सम्प्रदाय, अध्यात्म आदि ने मानव जाति को सर्वाधिक भ्रमित किया है और उसके मद्य संकीर्ण दीवारें खादी की हैं. विश्व का सर्वाधिक लम्बा युद्ध इस्लाम और इसाई धर्मावलम्बियों के मध्य हुआ है जो सन ६३० से आरम्भ होकर १७९१ तक चला. इसे 'यूरोप पर इस्लामी आक्रमण' कहा जाता है. भारत पर प्रथम इस्लामी आक्रमण ९३१ में हुआ और तब से अब तक देश में धार्मिक संघर्ष चलते रहे हैं और अब इन्होने आतंक का रूप ले लिया है.

जन-साधारण में ईश्वर के नाम का आतंक, ज्योतिष, भाग्य, जन्म-जन्मान्तर, भूत-प्रेत आदि के अंध-विश्वास भारतीय जनमानस को लगभग दो हज़ार वर्षों से डसते रहे हैं और इसमें वैज्ञानिक सोच को विकसित नहीं होने दिया गया है. इसी का परिणाम है कि भारत प्राकृत संपदा से संपन्न होते हुए भी पिछड़ेपन से उबार नहीं पाया है. धर्म, सम्प्रदाय, अध्यात्म आदि पर प्रतिबन्ध ही इसे पुनः 'सोने की चिड़िया' बना सकता है जैसा कि यह गुप्त वंश के शासन काल में विश्व-प्रसिद्ध था..   

भारत में व्यावसायिक शिक्षा - राष्ट्रद्रोह

भारत में व्यावसायिक शिक्षा का वाणिज्यीकरण कर दिया गया है - धन्य हैं अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह जो प्रत्येक कार्य को एक व्यवसाय मानते हैं और उसके दूरगामी अर्थशास्त्रीय पक्ष की अवहेलना करने में सिद्ध-हस्त हैं. इन्गीनिअरिंग, चिकित्सा, प्रबंधन, आदि क्षेत्रों की शिक्षा प्रदान करने में बहुत अधिक लागत की आवश्यकता होती है, किन्तु इन शिक्षाओं पर ही देश का वर्तमान और भविष्य टिका होता है, और इन पर देश द्वारा किया गया व्यय शीघ्र ही विकास के माध्यम से वापिस प्राप्त हो जाता है. किन्तु यह मामूली सा गणित देश के जाने-माने अर्थशास्त्रियों की समझ में नहीं आया और वे इनका वाणिज्यीकरण कर बैठे.

प्रत्येक व्यवसाय का एकमात्र लक्ष्य पूंजी निवेश कर शीघ्रातिशीघ्र लाभ कमाना होता है, दूरगामी लाभकर परिणामों के लिए सामयिक हानि उठाना व्यवसाय में स्वीकार्य नहीं होता, विशेषकर भारत में जहां नीतियों के निर्धारण क्षुद्र स्वार्थों की आपूर्ति हेतु किये जाते हैं और कभी भी उनमें परिवर्तन किये जा सकते हैं. शिक्षा वाणिज्य न होकर एक सेवा होती है और इसका दूरगामी परिणाम राष्ट्र का विकास होता है. इससे तुरंत लाभ कमाना राष्ट्रद्रोह के सम्कक्स है जो भारत के राजनेताओं ने विगत १०-१५ वर्षों में किया है.

व्यवसायिक शिक्षा के वाणिज्यीकरण के जो परिणाम हमारे सामने हैं, आइये उनपर एक दृष्टि डालें -
  • शिक्षा के स्तर में भारी गिरावट आयी है क्योंकि व्यवसायी इन शिक्षाओं के लिए अपेक्षित निवेश न करके न्यूनतम निवेश से काम चला रहे हैं. इन्गीनिअरिंग और चिकित्सा के क्षेत्रों में प्रयोगशालाओं का अत्यधिक महत्व होता है और उनके किये भारी निवेश की आवश्यकता होती है जो निजी व्यवसायी कदापि नहीं कर सकते. इन क्षेत्रों के शिक्षक भी अति मेधावी, शिक्षित एवं अनुभवी होने चाहिए और ऐसे विद्वान् सस्ते नहीं मिलते, जबकि निजी व्यवसायी सस्ते शिक्षकों से अपना व्यवसाय चला रहे हैं. उदाहरण के लिए भारतीय प्रबंधन संस्थानों में लगभग डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह वेतन पाने वाले प्रवक्ता सप्ताह में केवल दो घंटे पढ़ाते हैं, जबकि निजी प्रबंधन संस्थानों के प्रवक्ता १५-२० हज़ार रुपये के मासिक मासिक वेतन पर सप्ताह में न्यूनतम २४ घंटे अध्यापन कार्य कर रहे हैं. 
  • व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त करना भारतीय सासन-प्रशासन ने इतना महंगा बना दिया है कि इस क्षेत्र के व्यवसाय में भारी लाभ कमाने की संभावनाएं हैं, जिसके कारण वाणिज्यीकरण के बाद व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों ली संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. देश को जहाँ केवल ५०,००० अभियंताओं की प्रति वर्ष आवश्यकता होती है, वहां इस समय ३,००,००० अभियंता बनाए जा रहे हैं. स्पष्ट है कि इनको अपेक्षित शिक्षा न दी जाकर केवल कागजी उपाधियाँ वितरित की जा रही हैं. देश का शासन प्रशासन इस अनावश्यक अप्रत्याशित वृद्धि के प्रति व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण अंधा बना हुआ है. इससे उच्च शिक्षा प्राप्त बेरोजगारों की संख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है. अनेक व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त युवा छोटे-छोटे विद्यालयों में शिक्षक पदों पर अथवा अन्य तुच्छ कार्य करने के लिए विवश हैं. 
  • व्यावसायिक शिक्षा के वाणिज्यीकरण का सर्वाधिक दुष्प्रभाव मध्यमवर्गीय लोगों की अर्थ-व्यवस्था पर पड़ा है. उचक वर्गीय लोगों की तरह ये लोग भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा प्रदान करने की ललक में निजी क्षेत्र के व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों के शिकार बन रहे हैं और अपनी कठोर परिश्रम की कमाई इन शिक्षा संस्थानों को प्रदान कर रहे हैं और आशा करते हैं कि उनके बच्चे व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त कर उन्हें देश के उच्च वर्ग में सम्मिलित कर देंगे. किन्तु परिणाम इसके विपरीत ही प्राप्त हो रहे हैं. जीवन भर की कमाई इन शिक्षा संस्थानों को अर्पित करने के बाद जब उनके बच्चों को अपेक्षित रोजगार प्राप्त नहीं होते तो वे माध्यम वर्गीय से भी नीचे की ओर खिसक जाते हैं. इस स्थिति से अनेकानेक परिवार बर्बादी के कगार पर खड़े हैं. 
इस प्रकार भारत के शासक-प्रशासक वर्ग ने माध्यम वर्गीय लोगों की कमाई पर अपनी जेबें भारी हैं और निजी व्यवसायियों को लाभ पहुँचाया है. साथ ही देश के करोड़ों युवाओं को निराशाओं के अंधकूप में धकेला है, प्रत्येक दृष्टि से यह राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है और खुला राष्ट्रद्रोह है.