मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

मंतव्य, भय और नियति

गाँव में समाज-कंटक विरोधियों द्वारा राजनैतिक सत्ता हथियाने के बाद लोगों ने मुझे सार्वजनिक हितों के रक्षण हेतु ग्राम सभा का सदस्य बनाया. इससे जहां मैं प्रमुख विरोधी स्वर के रूप में स्थापित हुआ हूँ, वहीं सत्ता पक्ष में सन्नाटा छा गया है. ग्राम सभा के सदस्यों का बहुमत मेरे साथ है और उनके सहयोग के बिना ग्राम प्रधान विकास हेतु आबंटित सार्वजनिक धन का दुरूपयोग नहीं कर सकेगा. ग्राम प्रधान ने इस पद पर चुने जाने के लिए अनैतिक रूप से लगभग ३ लाख रुपये व्यय किये थे. इसके अतिरिक्त उसकी कृषि आय भी लापरवाही के कारण नगण्य है. इसलिए उसके लिए यह पद ही आय का स्रोत बनाना था, जो अब संभव नहीं रह गया है.


९ दिसम्बर को ग्राम पंचायत की सभा में ग्राम विकास हेतु विभिन्न समितियों का गठन होना था जिससे सदस्यों को दायित्व भार प्रदान होने थे. किन्तु भयभीत प्रधान ने इसमें रोड़ा लगाने के लिए स्वयं को अन्यत्र व्यस्त कहते हुए इसे टला दिया जिससे ग्राम विकास का कोई कार्य आरम्भ नहीं हो पाया है. अब उसने घोषित करना आरम्भ कर दिया है कि चूंकि वह ग्राम विकास से कोई आय नहीं कर सकता वह ग्राम विकास का कोई कार्य भी नहीं करेगा. सदस्य अगला कदम उठाने से पूर्व उसे लम्बा समय देना चाहते हैं ताकि उसके विरुद्ध प्रशासनिक कदम उठाये जा सकें.

ग्राम प्रधान का मंतव्य स्पष्ट है - अवैध आय अथवा ग्राम विकास ठप्प. इसके साथ ही उसे भय है कि उसकी अनियमितताओं के कारण उसे सदस्यों द्वारा अधिकारों से वंचित किया जा सकता है इसलिए वह सदस्यों को निष्क्रिय कर देना चाहता है जिसके लिए वह अवैध र्रोप से और भी धन व्यय करने के लिए तत्पर है. किन्तु ऐसा होना असंभव है, और उसे निरंतर भय में ही अपना ५ वर्ष का कार्यकाल पूरा करना है अथवा मध्य में ही अधिकारों से वंचित हो जाना है. यही उसकी नियति है.
Corruption in India

यह स्थिति केवल मेरे गाँव की न होकर समस्त भारत की है, जहां पदासीन राजनेता अपने दूषित मंतव्यों में लिप्त रहते हैं, साथ ही कुछ निष्ठावान लोगों से भयभीत रहते हैं, पदमुक्त होते रहते हैं अथवा सशक्त विरोध न होने पर सार्वजनिक संपदा को हड़पते रहते हैं. आज देश की लगभग ३० प्रतिशत संपदा के स्वामी राजनेता ही हैं जिनकी संख्या देश की कुल जनसँख्या का केवल ५ प्रतिशत है. अपने मंतव्यों को पूरा करने के लिए वे राज्यकर्मियों को भी भृष्टाचार में लिप्त करते है, जो उनके साथ सार्वजनिक संपदाओं को हड़पते रहते हैं. देश की यह लगभग १० प्रतिशत जनसँख्या लगभग ३० प्रतिशत सार्वजनिक संपदा की स्वामी बनी हुई है. देश की शेष ४० प्रतिशत संपदा पर देश की ८५ प्रतिशत जनसँख्या निर्भर है.