मंगलवार, 16 मार्च 2010

राजनीति में शैक्षिक योग्यता का विरोध

उत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्य मंत्री महोदया ने अभी कुछ दिन पूर्व एक घोषणा की थी कि प्रदेश के आगामी ग्राम प्रधान चुनावों में कक्षा १० उत्तीर्ण व्यक्ति ही प्रधान पड के प्रत्याशी बन सकेंगे. साथ ही ग्राम पंचायत सदस्यता के प्रत्याशियों के लिए कक्षा ८ उत्तीर्ण होना अनिवार्य होगा. यह एक साहसिक कदम था जो भारत की राजनीति में शिक्षा के प्रवेश से शोधन का शुभारम्भ होता. किन्तु भारत के प्रबुद्धजन इस घोषणा से उत्पन्न आश्चर्य और प्रसन्नता को आत्मसात भी नहीं कर पाए थे कि अगले ही दिन उद्घोषणा द्वारा उक्त शक्षिक अनिवार्यता को रद्द कर दिया गया. जिससे यह स्पश हो गया कि भारतीय राजनीति में शक्षा का कोई महत्व नहीं है.

उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर ज्ञात हुआ है कि उक्त घोषणा का रद्द किया जाना मुख्य मंत्री महोदया के समर्थकों के आग्रह पर हुआ जो विधान सभा के सदस्य हैं और अनेक निरक्षर हैं. यहाँ यह भी बतादूँ कि मेरे गाँव खंदोई के प्रधान, मेरे विकास खंड ऊंचागांव के प्रमुख, तथा बुलंदशहर से मेरे संसद सदस्य सभी निरक्षर हैं, जो भारतीय राजनीति का प्रतिबिम्ब है. इससे मैं अतीव शर्मसार हूँ. मुख्य मंत्री महोदया की इस विषयक प्रथम घोषणा से मैं अत्यधिक प्रसन्न हुआ था.

ग्राम प्रधान भारतील शासन व्यवस्था का नीचे से प्रथम स्तर का संवैधानिक पड है इसके लिए शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता का दूरगामी परिणाम यह होता कि एक न एक दिन उच्चतम स्तर तक के सभी राजनैतिक पदों के लिए शैक्षिक याग्यता अनिवार्य कर दी जाती जिससे भारत की राजनीति में गुणात्मक सुधार होना सुनिश्चित था. किन्तु इसके आरम्भ पर ही कुठाराघात कर दिया गया ताकि देश निरक्षरों के शासन में ही पिसता रहे.