मंगलवार, 16 मार्च 2010

अवतार और लेखक

हिंदी भाषा का दुर्भाग्य है कि इसमें सभी भावों के लिए प्रथक शब्दों का विकास नहीं किया गया है, जबकि भाषा के आदि पुरुषों ने वैदिक संस्कृत में शब्द विकास के अभूतपूर्व प्रयास किये थे. आधुनिक संस्कृत में वैदिक शब्दों के अर्थ विकृत किये जाने और हिंदी विकास का आधार आधुनिक संस्कृत होने के कारण हिंदी उन शब्दों का भी समावेश नहीं किया जा सका जो हमारे आदि पुरुषों ने हमारे लिए विकसित किये थे.

हिंदी के शब्द 'लेखक' का अर्थ 'लिखने का कार्य करने वाला व्यक्ति है, हो इस प्रकार के सभी व्यक्तियों के लिए उपयोग किया जाता है, जबकि यह कार्य दो भिन्न प्रकारों का होता है और दोनों में बहुत गंभीर अंतर होता है. प्रकृति के अध्ययन, वैज्ञानिक शोधों एवं प्रयोगों, गहन चिंतन, आदि के माध्यम से विकसित ज्ञान को वर्तमान और भावी पीढ़ियों हेतु लिखना एक दुष्कर प्रक्रिया है जो विरले ही कर सकते हैं. दूसरे प्रकार का लेखन कार्य उपलब्ध ज्ञान को अपने शब्दों में लिखना होता है. किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बोले गए शब्दों को लिखने वाले व्यक्ति को भी हिंदी में लेखक ही कहा जाता है.

वैदिक संस्कृत में शोधित एवं विकसित किये गए ज्ञान के अंकन करने वाले व्यक्ति को 'अवतार' कहा गया है, जिसका अर्थ आधुनिक संस्कृत में विकृत कर दिया गया और शब्द हिंदी में उपयोग किये जाने से वंचित हो गया. दूसरी ओर ज्ञानपरक लेखन करने वाले व्यक्ति के लिए उपयुक्त शब्द का अभाव उत्पन्न हो गया.इस आलेख में हम हिंदी के विस्तार एवं इस विषय पर लेखन की सुविधा के लिए अवतार शब्द का वही अर्थ लेंगे जो वैदिक संस्कृत में था, अर्थात 'ज्ञानपरक लेखक'.

समस्त मनाब जाति लेखन कार्य करने में सरलता से सक्षम हो सकती है किन्तु उसे अवतरण कार्य में सक्षम करना लगभग असंभव ही है. अवतरण कार्य केवल 'महामानव' ही कर सकते हैं. दूसरे शब्दों में अवतरण कार्य करने वाले ही महामानव बनाने की संभावना रखते हैं. इसके लिए उन्हें लेखन के विषय पर गहन अध्ययन, चिंतन एवं मनन करना होता है जिसका कष्ट सभी व्यक्ति नहीं करते क्योंकि मानव जाति स्वभावतः 'सुविधावादी' है. महामानव सुविधावादी न होकर संकल्प्वादी उत्प्रेरक होता है और वही मानव जाति को आगे ले जाने की सक्षमता रखता है.