शनिवार, 8 मई 2010

व्यक्तित्त्व और आदर्शवादिता

प्रत्येक व्यक्ति के अन्तः में उसके दो स्वरुप उपस्थित होते हैं - एक वह जो वह वास्तव में होता है, तथा दूसरा वह जो वह होना चाहता है. प्रथम स्वरुप उसकी परिस्थितियों पर निर्भर करता है जबकि दूसरा उसके आदर्शों पर. इन दोनों स्वरूपों में अंतराल हो सकता है क्योंकि सभी समय व्यक्ति की परिस्तितियाँ उसे उसके मनोनुकूल नहीं होने देतीं. इसी व्यवहारिक अंतराल के कारण कुछ दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोगों ने भाग्य का नाम दिया और उसके अध्ययन एवं सुधार के नाम पर ज्योतिष का व्यवसाय किया. 

बहुत सारे व्यक्ति मिलकर समाज बनाते हैं, और समाज की दीर्घकालिक स्थिति से प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थितियां बनती हैं. इन्हें अनुकूल बनाने के प्रयास किये जा सकते हैं किन्तु इनकी सफलता सुनिश्चित नहीं की जा सकती. इसीलिये मनुष्य को परिस्थितियों का दास कहा जाता है. कभी-कभी यह भी कहा जाता है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का स्वयं निर्माता होता है अथवा उन्हें अपने नियंत्रण में रख सकता है. किन्तु ऐसा कदापि संभव नहीं होता. ऐसी अवस्था में जो सर्वश्रेष्ठ किया जा सकता है वह परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को अभीष्ट रूप में संचालित किया जाये.

मनुष्य का शरीर और मन मिलकर एक इकाई के रूप में कार्य करते हैं जिससे उसकी जो छबि प्रत्यक्ष होती है उसे व्यक्ति का व्यक्तित्त्व कहा जाता है.  मनुष्य का मस्तिष्क उसके मन से प्रथक और स्वतंत्र रूप में कार्य करता है जिसमें उसकी स्मृति और चिंतन प्रमुख कर्म होते हैं.  इस प्रकार मन और मस्तिष्क में अंतर होता है. इन्ही मस्तिष्कीय कर्मों द्वारा व्यक्ति अपनी आदर्श धारणाएं विकसित करता है जो सामाजिक दृष्टि से अच्छी अथवा बुरी हो सकती हैं. इन आदर्श धारणाओं के अनुपालन के प्रयासों को व्यक्ति की आदर्शवादिता कहा जाता है.

अपने इन दो आतंरिक स्वरूपों के अतिरिक्त भी व्यक्ति का तीसरा स्वरुप होता है जो वह दूसरों को दर्शाना चाहता है, चाहे वह वास्तव में वैसा हो अथवा नो हो, या वैसा बनाने का प्रयास भी करता हो अथवा नहीं. व्यक्ति के इस तीसरे स्वरुप को उसका आडम्बर कहा जा सकता है. सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति वह होता है जिसके व्यक्तित्त्व, आदर्श और आडम्बर में समरूपता हो. चूंकि परिस्थितियोंवश ऐसा सभी समय संभव नहीं होता, इसलिए श्रेष्ठ व्यक्ति उसे माना जाता है जिसके आदर्श और आडम्बर में अंतराल न हो. जिनके आदर्श और आडम्बर में अंतराल होता है उन्हें पाखंडी कहा जाता है और ये व्यक्ति निम्न कोटि के होते हैं.

व्यवहारिक स्तर पर व्यक्ति के आदर्श और उसके व्यक्तित्त्व में अंतराल बना रहता है किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि व्यक्ति को इस अंतराल को कम करने के प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं होती. श्रेष्ठ व्यक्ति इस अंतराल को न्यूनतम करने के सतत प्रयास करते रहते हैं, अर्थात वे सदैव परिस्थितियों से संघर्ष में रत रहते हैं.