शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

आचार्य शंकर और सनातन धर्म

यवन समूह को सशक्त करने वाले एक मात्र शिक्षित व्यक्ति आचार्य शंकर थे. चूंकि यवन समूह का मुख्य उद्देश्य भारत में धर्मों के माद्यम से ईश्वर का आतंक और भ्रम फैलाकर यहाँ अपना शासन स्थापित करना था, इसलिए आचार्य शंकर के 'सनातन धर्म' को भी दुष्प्रचारित किया गया और उसके माध्यम से भी यवनों ने अपना मंतव्य सिद्ध किया. .

आचार्य शंकर ने ही आधुनिक संस्कृत को जन्म दिया और इस भाषा के आधार पर वेदों और शास्त्रों के त्रुटिपूर्ण अनुवाद प्रचारित किये ताकि लोग कभी इनके मूल मंतव्यों को न समझ सकें. आचार्य शंकर चूंकि एक प्रकांड पंडित थे इसलिए उनके वचनों को लोगों ने महत्व दिया और वे वेदों और शास्त्रों के मूल मंतव्यों से दूर हो गए. इससे यवन समूह का मार्ग सरल हो गया.

धर्म के क्षेत्र में आचार्य शंकर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा जो भारतीय जनमानस को अभी तक डस रहा है. शब्द 'सनातन धर्म' का मूल मंतव्य लोगों में स्वास्थ के महत्व को रेखांकित करना था किन्तु इसे लोगों के समक्ष छद्म रूप में एक नए धर्म के रूप में प्रस्तुत किया गया. सनातन धर्म के मंतव्य को सिद्ध करने के लिए आचार्य शंकर ने देश के चारों कोनों में चार मठ स्थापित किये -
उत्तर में बदरिकाश्रम में ज्योतिः पीठ, 
पूर्व में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पीठ,
दक्षिण में श्रृंगेरी में शारदा पीठ, तथा  
पश्चिम में द्वारिका में कालिका पीठ.

यहाँ यह स्पष्ट करना भी प्रासंगिक है कि शंकर और शिव का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है जैसा कि सामान्यतः माना जा रहा है. शंकर आचार्य शंकर का मूल नाम है जिन्हें आदिशंकराचार्य भी कहा जता है. जबकि शिव देव समुदाय की एक उपाधि है जो महेश्वर को दी गयी थी. जिन्हें महादेव भी कहा जाता है.

आज यह कहना सरल नहीं है कि आचार्य का मूल मंतव्य क्या था - जन-स्वास्थ को नष्ट करना या उसकी रक्षा करना. किन्तु इसका जो प्रभाव हुआ है वह रिनात्मक ही रहा है और सनातन धर्म का प्रचार प्रसार भी धर्म-आडम्बरों का प्रचार प्रसार ही सिद्ध हुआ है. यह आचार्य के साथ यवनों का छल भी हो सकता है.

वेदों और शास्त्रों का प्राथमिक लक्ष्य भी स्वास्थ की रक्षा है संभवतः इसी को रेखांकित करने के लिए आचार्य शंकर ने इनका सार वेदान्त के रूप में प्रस्तुत किया और सनातन धर्म के नाम से प्रचारित किया. किन्तु आज तक के किसी भी सनातन धर्म साहित्य को स्वास्थ के समर्पित नहीं कहा गया है और उसे धर्म-आडम्बरों के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया गया है. यहाँ तक कि बाद में प्रतिपादित हिन्दू धर्म प्रचारकों ने सनातन धर्म को ही हिन्दू धर्म का मूल स्वरुप कहा ताकि वे आचार्य शंकर की प्रतिष्ठा का अनुचित लाभ उठा सकें. 

सनातन धर्म के प्रभाव का आकलन करने के लिए हम बदरिकाश्रम की स्थिति को देखते हैं, जहां समस्त क्षेत्र में कभी तुलसी के वन फैले थे. यह केदारनाथ मंदिर की चारदीवारी पर अंकित एक तमिल कवि के वर्णन से सिद्ध होता है. बदरिकाश्रम में विष्णु के पूजन आदि में तुलसी की पत्तियों का उपयोग किया जाता रहा है जिसके कारण वहां के सभी तुलसी वन अब उजाड़ चुके हैं. स्थानीय मजदूर अपनी आजीविका के लिए तुलसी के एक इंच के अंकुरों को भी नोंच-नोंच कर पत्तियां प्राप्त करते हैं और उन्हें मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए प्रदान कर देते हैं. इससे वहां तुलसी के पौधों का विकास प्रतिबंधित हो रहा है.

तुलसी एक अति महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है जो वातावरण एवं शरीर में उपस्थित अनेक विकारों का शोधन कर जन-स्वास्थ की रक्षा करता है. उत्तर में इसके वनों का विशेष महत्व है क्योंकि वहाँ से सुगन्धित वायु देश के बड़े भूभाग को स्वास्थ्जनक बना सकती है. पूजा-अर्चना में तुलसी के उपयोग के अनुत्पादक उपयोग से वहां इसके वनों को नष्ट किया गया है जो किसी भी मानवीय धर्म में मान्य नहीं हो सकता. इसमें आचार्य शंकर का सीधा योगदान है अथवा यवन समूह द्वारा उनको गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया है, यह शोध का विषय है. .