सोमवार, 26 अप्रैल 2010

संवेदनशीलता एवं सार्थकता

बहुधा ऐसा होता है कि जब मैं किसी गंभीर विषय पर लिखने बैठता हूँ तो हिंदी में उपयुक्त शब्दों का अभाव पाता हूँ. भावुक हिन्दीभाषी इसे मेरी भाषाई निर्बलता कहेंगे अथवा मुझसे रुष्ट होंगे. किन्तु सत्य यही है कि हिंदी में अभी भी शब्दों का नितांत अभाव है. अभी मैं जो लिखना चाहता हूँ उसे कोई हिंदी शीर्षक देना चाहता हूँ जिसका भाव अंग्रेज़ी के sensitivity and sensibility के समतुल्य हो किन्तु sensibility के लिए हिंदी समतुल्य शब्द नहीं पा रहा हूँ और इसके लिए 'सार्थकता' शब्द से काम चला रहा हूँ. आशा है प्रबुद्ध पाठक मुझे क्षमा करेंगे अथवा मुझे कोई उपयुक्त शब्द सुझायेंगे.

जनसाधारण की हिन्दुस्तानी भाषा में कहा जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने दिल, दिमाग अथवा इनके सामंजस्य के अधीन कार्य करता है.  विशुद्ध दिल के अधीन कार्य कराने को मैं यहाँ 'संवेदनशीलता' कहना चाहूँगा और विशुद्ध दिमाग के अधीन कार्य करने को 'सार्थकता'.  तकनीकी स्तर पर इन दो विधाओं को चिंतन-शून्यता तथा चिन्तनशीलता कहा जा सकता है.  इसी संलेख के एक अन्य आलेख में मैंने इन्हें मन और मस्तिष्क के अधीन कार्य कहा है, जहां मैंने प्रतिपादित किया है कि मनुष्य का मन चिंतन-शून्य होता है और केवल इच्छाओं के अधीन होता है, जब कि उसका मस्तिष्क चिंतन का केंद्र होता है और सार्थकता के आधार पर शरीर से कार्य कराता है.
Science in the Age of Sensibility: The Sentimental Empiricists of the French Enlightenment
Ideal Embodiment: Kant's Theory of Sensibility (Studies in Continental Thought)
संवेदनशील व्यक्ति प्रसंग की सार्थकता को अनदेखी कर सकता है और वह अत्यधिक भावुक होता है. छोटा सा दुःख उसे विचलित कर देता है और वह जीवन से मोह भी त्याग सकता है. इनकी भावुकता दो प्रकार की होती है - ऋणात्मक जिसमें इनें अत्यधिक क्रोध अथवा द्वेष उत्पन्न हो जाता है और ऐसे आवेश में व्यक्ति हत्या जैसे सामाजिक अपराध भी कर बैठते हैं. इनकी ये प्रतिक्रियाएं प्रायः तत्क्षण होती हैं जिससे इन्हें चिंतन का समय नहीं मिलता. तीव्र कामेच्छा भी इसी प्रकार के ऋणात्मक आवेश के कारण होती है, जिसके अधीन व्यक्ति बलात्कार जैसे अपराध कर बैठता है. संवेदन व्यक्ति की धनात्मक  भावुकता में व्यक्ति प्रेम, मोह, आदि के वशीभूत हो जाता है और उसमें आत्मबलिदान की भावना अति प्रबल हो जाती है. ऐसे व्यक्ति विरक्त सन्यासी हो सकते हैं और ऐसे व्यक्ति ही आत्महत्या भी कर लेते हैं.

दूसरी ओर चिंतनशील व्यक्ति प्रसंग की सार्थकता पर इतना अधिक चिंतन करते हैं कि वे उसके मानवीय पक्ष की अनदेखी कर देते हैं. ऐसे व्यक्ति निर्मोही अथवा निष्ठुर कहे जा सकते हैं क्योंकि वे सभी दूसरों को एक समान मानने के कारण किसी को भी अपना नहीं मान पाते. इस कारण ये सभी से एक समान व्यवहार करते हैं. इतना निश्चित है कि ऐसे व्यक्ति कभी कोई अपराध नहीं कर सकते.  रचनात्मकता इस प्रकार के व्यक्तियों की विशेषता होती है जिसके कारण ये व्यक्ति लेखक, चित्रकार, आदि हो सकते हैं. ऐसे व्यक्तियों से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों को प्रायः ऐसा प्रतीत होता है कि इन व्यक्तियों में मानवीय भावनाएं शून्य अथवा नगण्य होती हैं, जो एक ब्रंती मात्र है. वस्तुतः इन व्यक्तियों में मानवीय भावनाएं अति उच्च कोटि की होती हैं किन्तु इनमें अपने-पराये की भावना नहीं होती. आन, यदि अपने-पराये की भावना को ही मानवीय भावना माना जाये तो कहा जा सकता है कि ये व्यक्ति मानवीय भावना शून्य होते हैं.  

मस्तिष्क व्यक्ति के ज्ञान का केंद्र होता है जिसके आधार पर वह चिंतन करता है. किन्तु ज्ञान के सतत प्रसार के कारण न तो मानवीय ज्ञान कभी पूर्ण हो सकता है और न ही किसी एक व्यक्ति को पूर्ण मानवीय ज्ञान हो सकता है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सीमित ज्ञान ही होता है इसलिए उसका चिंतन भी सीमित ही रहता है. इसलिए केवल ज्ञान अथवा चिंतन के आदार पर भी कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं हो सकता. तथापि प्रत्येक व्यक्ति का ज्ञान ही उसकी सर्वोपरि निधि होती है.

न तो मन पूरी तरह दूषित होता है जिससे उसके अधीन कार्य करना त्याज्य हो, और न ही मस्तिष्क पूरी तरह शुद्ध होता है जिसके अधीन कार्य करना श्रेष्ठ हो. अतः वांछनीय यही है कि व्यक्ति मन और मस्तिष्क के सामंजस्य से कार्य करे.