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रविवार, 5 सितंबर 2010

विश्वीय दृष्टिकोण, स्थानीय कर्म

बौद्धिक जनतंत्र के लिए स्थानीय हितों की रक्षा सर्वोपरि होता है - राष्ट्र, क्षेत्र, गाँव, आदि के सापेक्ष. जबकि विकासशील विश्व में जनतंत्र के अंतर्गत प्रत्येक उत्तम वस्तु निर्यात कर दी जाती है उस विदेशी मुद्रा के लिए जिस के उपयोग से घटिया वस्तुएं देश में लाई जाती हैं. यह किसी व्यावसायिक इकाई के लिए हितकर प्रतीत हो सकता है किन्तु राष्ट्र और समाज के लिए अनेक प्रकार से अनुत्पादक सिद्ध होता है और बौद्धिक दृष्टि से अनैतिक भी है.


यहाँ एक मौलिक प्रश्न उभरता है - विश्वीय दृष्टिकोण की आवश्यकता ही क्या है? इसका हमारे पास एक अति उत्तम उत्तर है. यदि लोग जो चाहें, उन्हें सरकार द्वारा वही सब उपलब्ध कराया जाए तो वे संतुष्ट हो सकते हैं. किन्तु बौद्धिक विश्व इससे संतुष्ट नहीं हो सकता. लोग केवल वही चाह सकते हैं जो वे जानते हैं, किन्तु विश्व में उनके ज्ञान के अतिरिक्त भी बहुत कुछ होता है जो उन्हें शासन द्वारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए. इससे शासन में लोगों की आस्था सुदृढ़ होती है और विश्वीय विकास से लोगों की सेवा संभव होती है. इसके लिए शासकों के विश्वीय दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य होता है.


विश्वीय दृष्टिकोण से स्थानीय कर्म संलग्न होने से शासन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विकसित उत्पादों को देश में आयात की अनुमति प्राप्त ना होकर उन उत्पादों के देश में ही उत्पादन एवं लोगों द्वारा उपभोग उत्प्रेरित होता है. इससे देश में व्यवसाय और रोजगार के नए अवसर विकसित होते हैं जिनसे व्यक्तिगत और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती है. 


शासन का विश्वीय दृष्टिकोण देश की अर्थव्यवस्था के विश्वीकरण से भिन्न प्रक्रिया है. विश्वीकरण में विश्व-स्तरीय कर्म अपनाया जाता है जो पूरी तरह अव्यवहारिक होता है जब कि विश्वीय दृष्टिकोण में केवल विकास का विश्वीय दर्शन अपनाया जाता है जिसे स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुकूल किया जाकर स्थानीय कर्मों में उसका उपयोग किया जाता है. इससे विकास प्रक्रिया स्थानीय कर्मों से संचालित होती है. 


वस्तुतः, भूमंडल पर प्रशासनिक और भौगोलिक सीमाओं की उपस्थिति के कारण विभिन्न स्थानों पर भिन्न परिस्थितियों का सृजन होता है जिनके कारण विश्वीय कर्म संभव नहीं हो सकता. इसलिए कर्म स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप स्थानीय स्तर पर ही संभव होता है. केवल दृष्टिकोण ही विश्वीय हो सकता है जिसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय कर्म में परिणित किया जाता है. .  


स्थानीय दृष्टिकोण से सीमित स्थानीय कर्म होने से स्थानीय विकास स्थानीय स्तर तक ही सीमित रहता है जिसका लाभ अन्य स्थानों को प्राप्त नहीं हो पाता. विश्वीय दृष्टिकोण अपनाए जाने से दूसरे स्थानों के विकास का ही लाभ नहीं उठाया जाता, स्थानीय विकास का लाभ भी सुदूर स्थानों को प्राप्त होता है. इस प्रकार विश्वीय दृष्टिकोण विकास प्रक्रिया को विश्व स्तर तक विस्तृत करता है. 
Globalisation Fractures


उपरोक्त के अतिरिक्त, विश्वीय दृष्टिकोण से संपन्न स्थानीय कर्म केवल कर्म-स्थल हेतु ही उपयुक्त नहीं होता अपितु उसी प्रकार के अन्य स्थलों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होता है. उदाहरणार्थ, विश्वीय दृष्टिकोण के साथ एक छोटे से गाँव में किया गया कर्म उस प्रकार के अन्य गाँवों में भी विकास के लहर का सृजन करता है. इस लहर के सृजन का कारण यह है कि दृष्टिकोण को स्थानीय पारिस्थितिकी हेतु अनुकूलित कर लिया गया होता है जिसे उसी पारिस्थितिकी के अन्य स्थानों पर भी सरलता से लागू किया जा सकता है. 

शनिवार, 3 जुलाई 2010

सत्ता हस्तांतरण : बुद्धि, बल और छल के मध्य

भारत में राज्य सता का हस्तांतरण बार-बार होता रहा है, जिसमें प्रमुखतः तीन गणक सम्मिलित रहे हैं - बल, छल और बुद्धि. भारत में राज्य सत्ता का श्री गणेश देवों द्वारा किया गया, किन्तु महाभारत संघर्ष में बल और छल-कपट की विजय हुई और नैतिक मूल्यों की पराजय. इस सिकंदर के समर्थन से महापद्मानंद भारत का सम्राट बना.

महापद्मानंद के सम्राट बनने के बाद विष्णु गुप्त चाणक्य सर्वाधिक हताहत हुए. उनके पास कोई बल शेष नहीं था किन्तु वे बुद्धि के धनी थे. अपने मित्र चित्र गुप्त और पुत्र चन्द्र गुप्त के साथ मिलकर उन्होंने बुद्धि का उपयोग करते हुए उन्होंने भारत की राज्य सत्ता पर अधिकार किया और चन्द्र गुप्त को भारत का सम्राट बनाया. यहीं से गुप्त वंश का शासन स्थापित हुआ जिसमें भारत को विश्व भर में 'सोने की चिड़िया' कहलाने का गौरव प्राप्त हुआ.

पासा फिर पलटा. समुद्र गुप्त जैसे कुछ गुप्त वंश के शासकों के अतिरिक्त शेष शासक बुद्धि-संपन्न तो थे किन्तु उनमें बल का अभाव था. इसके लिए वे बलशालियों की सेना पर आश्रित थे. कालांतर में इन बल-शालियों ने राज्य सत्ता पर अपना अधिकार कर लिया, और बुद्धि पराजित हुई. ये बल-शाली युद्ध कला में तो पारंगत थे किन्तु शासन व्यवस्था में अयोग्य सिद्ध हुए. इनके शासन में देश छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित हो गया और शासकों का अधिकाँश समय युद्ध क्षेत्र में ही व्यतीत होने लगा. इससे शासन व्यवस्था चरमरा गयी. यह अराजकता भारत में लगभग ७०० वर्ष तक रही.

इस अराजकता का लाभ उठाने के लिए कुछ लुटेरे भारत में आये जिनके पास बल और छल दोनों थे. इनका उपयोग करते हुए उन्होंने भारत में इस्लामी शासन स्थापित कर दिया, जो विभिन्न नामों से लगभग ७०० वर्ष चला. इस शासन की सर्वाधिक निर्बलता शासकों के भोग-विलास थे जिनके लिए वे ५०० की संख्या तक स्त्रियाँ रखते थे. इस प्रकार के विलासों ने शासकों की बुद्धि और बल दोनों का हरण कर लिया. इसके प्रभाव में उन्होंने बुद्धि संपन्न अंग्रेजों को भारत में आने के लिए आमंत्रित कर दिया. इस प्रकार बल और छल पर पुनः बुद्धि की विजय हुई, और देश में अंग्रेजों ने अपना शासन स्थापित कर लिया.

अंग्रेजों के सासन में भारत की धन-संपदा का सतत शोषण होता रहा जिससे ब्रिटिश खज़ाना भरता रहा.यह शोषण इस सीमा तक पहुँच गया कि जन-साधारण के पास जीवन की रक्षा के लिए 'करो या मरो' के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग शेष न रहा. इस जन आन्दोलन का नेतृत्व महात्मा गाँधी ने किया. इसके साथ ही नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 'आजाद हिंद सेना' का गठन कर अंग्रेजों को बल-शाली चुनौती भी दी. इन दोनों कारणों से अंग्रेजों को भारत स्वतंत्र करना पडा, और देश की राज्य सत्ता ऐसे लोगों के हाथ में आ गयी जो शासन करने के लिए न तो बल से संपन्न थे और न ही बुद्धि से. अतः मात्र छल ही उनके शासन तंत्र की विशिष्टता रही.इस शासन का नेतृत्व जवाहर लाल नेहरु ने किया.

नेहरु के बाद सत्ता की स्वामिनी इंदिरा बनी जिसे छल के साथ बल की भी आवश्यकता अनुभव हुई जिसके लिए उसने देश भर के असामाजिक तत्वों का आश्रय लिया और देश पर बल और छल के साथ शासन किया. कालांतर में बल-शालियों को अपनी सामर्थ्य का आभास हुआ और उन्होंने सत्ता हथियाने के साथ-साथ छल भी सीख लिए. इस प्रकार भारत में आज बल और छल का शासन स्थापित है.

अगला परिवर्तन में देश पर बुद्धि का शासन होना अवश्यम्भावी है किन्तु यह तभी होगा जब देश का प्रबुद्ध वर्ग इसके लिए जागृत हो और संघर्ष करे. जहां तक जन-साधारण का प्रश्न है, यह सता परिवर्तन में कभी भी महत्वपूर्ण गणक नहीं रहा है - यहाँ तक कि आज के तथाकथित जनतांत्रिक शासन में भी. आज की स्थिति कुछ उसी प्रकार की है जैसी कि विष्णुगुप्त चाणक्य के समय थी जब बुद्धि ने बल और छल दोनों को पराजित लिया था.

बौद्धिक मतभेद : कारण और निवारण

बौद्धिक जनतंत्र स्थापना के लिए सर्व प्रथम यह अनिवार्य है कि बौद्धिक लोग एक मंच पर एकत्रित हों और देश को एक कुशल शासन व्यवस्था प्रदान करने हेतु एक मत हों. इसमें सब से बड़ी बाधा यह है बौद्धिक लोग प्रायः किसी बिंदु पर परस्पर समत नहीं होते. इसका लाभ देश के अन्य लोग उठाते हैं और वे बौद्धिक लोगों को एक किनारे कर देते हैं अथवा उनका उपयोग अपने हित साधन में करते हैं.

बौद्धिक लोगों में अन्य लोगों की तरह ही व्यक्तिगत अंतर होते हैं. इस अंतराल का प्रभाव उनके चिंतन पर भी पड़ता है. चूंकि बौद्धिक जनों की विशिष्टता ही यह होती है कि वे चिंतन करते हैं और चिंतन किये गए विषयों पर अपना मत विकसित करते हैं. चूंकि चिंतन पूर्णतः लक्ष्यपरक न होकर अंशतः व्यक्तिपरक होता है इसलिए बौद्धिक लोगों के मत प्रायः परस्पर भिन्न हो जाते हैं. इसके विपरीत जन-साधारण न तो कोई चिंतन करते हैं और न ही किसी विषय पर अपना कोई मत विकसित करते हैं. इसलिए वे किसी भी मत से असहमत नहीं होते. उनके समक्ष जो भी मत प्रकट किया जाता है वे उसी से युरांत एवं सहर्ष सहमत हो जाते हैं. साथ ही दूसरा मत उनके समक्ष आने पर वे उस से भी सहमति जता देते हैं. बौद्धिक और अबौद्धिक जनों के इस अंतराल के कारण बौद्धिक जनों में प्रायः मत-भेद और अबौद्धिकों में प्रायः सहमति पायी जाती है.

बौद्धिक लोगों में स्वाभाविक मतभेद होने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि उनमें सहमति विकसित ही नहीं हो सकती, किन्तु यह दुष्कर अवश्य होती है. बौद्धिक लोगों में विचार शीलता के कारण असहमति होती है, और इसी विचार शीलता से ही उनमें सहमति विकसित की जा सकती है. इसके दो उपाय हैं, जिन दोनों को ही इस कार्य के लिया उपयोग किया जा सकता है.

बौद्धिक जनों में सहमति का प्रथम उपाय सतत विचारशीलता और विचार विमर्श है. विचार-शीलता का एकीकरण सिद्धांत यह है कि किसी एक समस्या का एक ही सर्वोत्तम हल होता है. इसलिए यदि अनेक व्यक्ति किसी एक समस्या पर सतत विचार करते रहें तो वे सभी अंततः एक ही समाधान पर पहुचेंगे. आवश्यकता बस यह है कि वे सर्वोत्तम समाधान की खोज में सतत चिंतन करते रहें.
उक्त सहमति का दूसरा उपाय यह है कि बौद्धिक जन अपना चिंतन लक्ष्यपरक करें जिसके लिए उन्हें व्यक्तिपरक चिंतन से दूर रहने का भरसक प्रयास करना होगा. पूर्णतः लक्ष्यपरक चिंतन भी सभी बौद्धिक जनों को एक ही लक्ष्य और उसके मार्ग पर पहुंचा देगा.   
How History Made the Mind: The Cultural Origins of Objective Thinking

भारत के समक्ष इस समय विकराल राजनैतिक संकट है, जिससे केवल बौद्धिक समाज ही मुक्ति दिला सकता है - अपने-अपने व्यक्तिगत अंतर भुला कर और किसी समाधान पर एक मत होकर. बौद्धिक जनतंत्र उनके विचार हेतु एक पृष्ठभूमि का कार्य कर सकता है. 

सोमवार, 28 जून 2010

पुलिस पर चर्चा का खुला आकाश

 इसी संलेख पर मेरे एक आलेख 'अपराध और चिकित्सा सेवा' पर ग्राम्या उपनामित एक भारत पुत्री ने एक टिप्पणी की थी जिसमें पुलिस प्रशिक्षण पर प्रश्न उठाया था. मैंने वह टिप्पणी उत्तर प्रदेश पुलिस के उप महा निरीक्षक (प्रशिक्षण) श्री जसवीर सिंह को विचारार्थ भेज दी थी. सूचनार्थ पुनः बता दूं कि श्री जसवीर सिंह इंडिया रेजुविनेशन इनिशिएतिव से सम्बद्ध हैं और देश की स्थिति से चिंतित ही नहीं इसमें गुणात्मक सुधार हेतु प्रयासरत हैं. मुझपर उनका बड़ा उपकार है - उन्होंने मेरी गाँव में गुंडों के साथ संघर्ष में अभूतपूर्व सहायता की है. प्रिय ग्राम्या की उक्त टिप्पणी और श्री जसवीर सिंह जी का प्रत्युत्तर नीचे दिए जा रहे हैं, ताकि श्री सिंह द्वारा वांछित विषय पर प्रबुद्ध पाठक चर्चा कर सकें और राष्ट्र हित में अपना योगदान कर सकें.   

ग्राम्या की टिप्पणी :
इस देश का आम आदमी पुलिस के पास अपनी समस्या लेकर जाने से डरता है। यदि वह आम औरत हो तो यह डर और भी बढ़ जाता है। क्या पुलिस की ट्रेनिंग में यह नहीं सिखाया जाता कि पुलिस को जनता के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए? हमारी पुलिस अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित है। धीरे-धीरे वह आम जनता में अपना विश्वास खो चुकी है। विशेषकर ग्रामीण इलाके के लोगों के साथ पुलिस का व्यवहार और भी आपत्तिजनक होता है। देश के कई हिस्सों में इस व्यवस्था के प्रति बढ़ रहे असंतोष को देखते हुए भी इन्हें आत्ममंथन की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

श्री जसवीर सिंह  का प्रत्युत्तर :
प्रिय राम राम बंसल जी,
                                          मैं आप से सहमत हूँ । यह भी देखना होगा की ऐसे कैसे हुया कि गांधी जी ने आजादी के बाद की  पुलिस कैसे होगी के विषय में कहा था कि मैं अपने देश की पुलिस को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखना चाहता हूं। लेकिन ऐसे क्यों हुया की पुलिस में आजादी के बाद कोई परिवर्तन नहीं आया या नहीं लाया गया। इस पर विचार करिएगा और मुझे भी बताईएयगा। 
आप का धान्यवाद,
जसवीर

मैं इस चर्चा के आरम्भ में यह कहना चाहूँगा कि गांधीजी ने उक्त इच्छा व्यक्त की थी किन्तु किसी ने उनकी इच्छा पर ध्यान नहीं दिया, विशेषकर नेहरु ने जिन्होंने स्वतन्त्रता के बाद देश के शासन की बागडोर संभाली थी. इस अवहेलना दूसरा बड़ा कारण यह था कि देश के लिए स्वतन्त्रता की मांग करने वाले लोगों ने स्वतन्त्रता से पूर्व कभी इस विषय पर चिंतन एवं विचार-विमर्श नहीं किया कि वे स्वतन्त्रता के बाद इस देश को कैसे चलाएंगे. अतः स्वतन्त्रता प्राप्ति पर इधर-उधर से नक़ल कर एक फूहड़ संविधान भारत पर थोप दिया गया जो भारत के जनमानस के अनुकूल सिद्ध नहीं हो पाया है.

वस्तुतः भारतीय जनमानस जनतांत्रिक शासन के लिए उपयक्त न तो तब था, न ही आज तक बन पाया है, और न ही इसका कोई प्रयास किया गया है. इसी कारण से भारत को एक नयी शासन व्यवस्था की आवश्यकता है जिसे मैं बौद्धिक जनतंत्र कहता हूँ जिसमें देश की शासन व्यवस्था में बौद्धिक सुयोग्यता को आधार बनाया जाए और ऐसे प्रावधान हों कि प्रत्येक नागरिक को एक समान उत्थान के अवसर उपलब्ध हों. इसके लिए स्वास्थ सेवाएँ, शिक्षा और न्याय व्यवस्था पूरी तरह निःशुल्क हों. भूमि पर निजी स्वामित्व समाप्त हो तथा प्रत्येक नागरिक परिवार को आवास हेतु निःशुल्क भूमि प्रदान की जाये ताकि देश की इस प्राकृत संपदा पर सभी को पाँव धरने का सम्मान प्राप्त हो सके.

आगे निवेदन हैं कि सभी प्रबुद्ध जन इस विषय पर गंभीरता के साथ विचार करें, और अपने सुझाव देन ताकि भारत की पुलिस में गुणात्मक सुधारों के लिए एक पहल हो सके.

रविवार, 20 जून 2010

राजनैतिक लूट और बौद्धिक नैतिकता का संघर्ष

भारत की वर्तमान स्थिति ऐसी है जिसे राजनेताओं द्वारा जनता की लूट कहा जा सकता है, इसी लूट को भारत की वर्तमान 'राजनीति' कहा जा सकता है. ऐसी स्थिति में बौद्धिक जनतंत्र की स्थापना हेतु इस राजनीति से बौद्धिक नैतिकता को कड़ा संघर्ष करना होगा. वस्तुतः यह संघर्ष छुट-पुट अवस्था में चारों ओर दिखाई भी देने लगा है, आवश्यकता बस इन संघर्षों के समन्वय की है, जिसमें अनेक कठिनाइयाँ हैं. इनके निराकरण के लिए निम्नांकित विचारणीय बिंदु हैं -

उद्येश्य और प्रक्रिया 
भारत को वस्तुतः दूसरे स्वतन्त्रता संग्राम की आवश्यकता है ताकि देश की व्यवस्थाओं को सुधार जा सके. इस उद्येश्य पर सभी सहमत हैं किन्तु इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाये इस पर कुछ मतभेद हो सकते हैं. इस बारे में मेरा सुविचारित मत यह है कि भारत की वर्तमान राजनैतिक स्थिति इतनी दूषित हो चुकी है कि इसमें छुट-पुट परिवर्तनों से कोई अपेक्षित लाभ प्राप्त नहीं हो सकता, इसलिए हमें आमूल-चूल परिवर्तनों के लिए संघर्ष करना होगा. तथापि मेरी यह जिद न होकर मात्र आग्रह है. इस पर गहन विचार विमर्श की आवश्यकता है. 

अपना संगठन
भारत में किसी प्रकार की पुनर्व्यवस्था लागू करने के लिए अथवा इस हेतु संघर्ष के लिए बौद्धिक वर्ग के एक समन्वित संगठन की आवश्यकता है, इस पर कोई मतभेद नहीं है. इसी पवित्र उद्येश्य हेतु अनेक बुद्धिवादियों ने संगठनों के निर्माण भी किये हुए हैं. किन्तु दुःख इस बात का है कि ऐसे अधिकाँश संगठन वर्तमान राजनैतिक दलों की भांति व्यक्तिगत जमींदारियों की तरह बनाए गए और संचालित किये जा रहे हैं, जिनमें अन्य व्यक्तियों को अपनत्व का बोध नहीं मिल पाता. होता यह है कि कुछ विचारक मिलते हैं और एक संगठन का नामकरण कर स्वयं के मध्य उसके पदों का वितरण कर लेते हैं. इसके बाद अन्य व्यक्तियों को अनुयायियों के रूप में भर्ती होने के लिए आमंत्रित किये जाते हैं. इस प्रक्रिया से संगठन को न तो जन-समर्थन प्राप्त हो पाता है और न ही उसका आगे विकास हो पाता है.

वस्तुतः होना यह चाहिए कि आरंभिक विचारक संगठन की रूपरेखा तो बनाएं किन्तु उसके पदों का वितरण न करें और मुक्त भाव से उसके सदस्यों की संख्या बढ़ाएं, जिनकी संख्या पर्याप्त होने पर ही उनमें से जनतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा सीमित अवधि के लिए संगठन के पदाधिकारी चुनें. इस प्रकार के संगटन पर किसी व्यक्ति अथवा समूह का एकाधिकार नहीं होगा और सभी लोगों को उसमें रूचि बनी रहेगी.   

संविधान की पुनर्रचना

प्रायः प्रत्येक भारतीय बुद्धिवादी देश की वर्तमान राजनैतिक स्थिति पर चिंतित है, और सभी परिवर्तन चाहते हैं. किन्तु यह परिवर्तन कैसे हो इस पर गहन मतभेद हैं. इस दृष्टि से बुद्धिवादियों को अनेक वर्गों में रखा जा सकता है. एक वर्ग ऐसा है जो वर्तमान संविधान को सही मानता है किन्तु इसके कार्यान्वयन में दोष देखता है. दूसरा वर्ग वह है जो संविधान को ही दोषी मानता है जिसके कारण ही उसका सही कार्यान्वयन नहीं हो सका है. इस के समर्थन में तर्क यह है कि जो अपेक्षित परिणाम न दे सके, उसमें दोष है अतः उसे बदला जाना चाहिए. संविधान के दोषपूर्ण होने का एक संकेत यह भी है कि इसके विभिन्न प्रावधानों में बार बार संशोधन करने पड़े हैं. ऐसे अनेक संशोधन भी राजनैतिक विकृति के परिणाम हैं जिनसे कुछ लाभ होने के स्थान पर हानि ही हो रही है. उदाहरण के लिए एक नौसिखिया प्रधान मंत्री ने मताधिकार की न्यूनतम आयु २१ वर्ष से घटाकर १८ वर्ष कर दी, जबकि सभी मानते हैं कि १८ वर्ष का बालक राष्ट्रीय दायित्व वहन करने योग्य नहीं होता. यहाँ तक कि उसे अपनी वैवाहिक दायित्व के लिए भी अयोग्य मानते हुए उसके विवाह की न्यूनतम आयु २१ वर्ष रखी गयी है. राष्ट्रीय दायित्व के निर्वाह हेतु व्यक्ति में वैचारिक परिपक्वता की अनिवार्यता होती है जो २५ वर्ष आयु से पूर्व अपेक्षित नहीं है. इसी प्रकार देश में प्रचलित आरक्षण व्यवस्था पर गहन मतभेद हैं और इससे देश को हानि ही हो रही है. इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत का वर्तमान संविधान में इस प्रकार की अनेक विसंगतियां हैं.
Original Intent: The Courts, the Constitution, & Religion 
संवैधानिक विसंगतियों का एक विशेष कारण यह है कि स्वतन्त्रता संग्राम के समय यह कभी विचार नहीं किया गया कि हम स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद देश की व्यवस्था कैसे करेंगे. इस कारण से स्वतन्त्रता प्राप्ति पर कुछ इधर-उधर से और अधिकांशतः गुलाम देशों के लिए प्रचलित ब्रिटिश संविधान की नक़ल कर डाली गयी जिसमें बार-बार राजनैतिक स्वार्थों के लिए संशोधन किये गए. अतः भारत की कुशल व्यवस्था के लिए एक नवीन संविधान की आवश्यकता है. इस नए संविधान के रूप रेखा के रूप में इस संलेख में बौद्धिक जनतंत्र हेतु सुझाये गए विविध प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है.

रविवार, 13 जून 2010

बौद्धिक जनतंत्र में तुरंत क्या किया जायेगा


बौद्धिक जनतंत्र संपूर्ण रूप में एक नवीन व्यवस्था है जिसमें शोषण के लिए कोई स्थान नहीं है. अतः अनेक शक्तिशाली लोग इसका विरोध भी करेंगे जिसके कारण संपूर्ण व्यवस्था को कारगर बनाने में कुछ समय लगेगा. दूसरे इसके लिए संविधान की नए सिरे से रचना की जायेगी जिसके लिए भी समय की अपेक्षा है. तथापि सुधरी व्यवस्था के अवसर प्राप्त होते ही जो कदम तुरंत उठाये जायेंगे वे निम्नांकित हैं -
  •  देश की न्याय व्यवस्था के प्रत्येक कर्मी को उस समय तक ८ घंटे प्रतिदिन एवं ७ दिन प्रति सप्ताह कार्य करना होगा जब तक कि ऐसी स्थिति न आ जाये कि वाद की स्थापना के तीन माह के अन्दर ही उसका निस्तारण न होने लगे. प्रत्येक न्यायालय को प्रतिदिन न्यूनतम एक दावे पर अपना निर्णय देना होगा.  
  • केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सर्वोच्च न्यायालय के अधीन कर वर्तमान राजनेताओं के कार्यकलापों के अन्वेषण कार्य पर लगाया जाएगा जिनके दोषी पाए जाने पर उनकी सभी सम्पदाएँ राज्य संपदा घोषित कर दी जायेंगी.
  • राजकीय पद के दुरूपयोग को राष्ट्रद्रोह घोषित किया जायेगा जिसके लिए त्वरित न्याय व्यवस्था द्वारा मृत्यु दंड दिए जाने का प्रावधान किया जाएगा जिससे भृष्टाचार पर तुरंत रोक लग सके.
  • देश में अनेक राजकीय श्रम केंद्र खोले जायेंगे जहाँ उत्पादन कार्य होंगे. ये केंद्र कारागारों का स्थान लेंगे. वर्तमान कारागारों में सभी बंदियों पर एक आयोग द्वारा विचार किया जाएगा, जिनमें से निर्दोषों को मुक्त करते हुए शेष को श्रम केन्द्रों पर अवैतनिक श्रम हेतु नियुक्त कर दिया जाएगा.
  •  देश में सभी प्रकार नशीले द्रव्यों के उत्पादन एवं वितरण पर तुरंत रोक लगा दी जायेगी जिसके उल्लंघन पर मृत्युदंड का प्रावधान होगा.
  • सभी शहरी विकास कार्यों पर तुरंत रोक लगाते हुए उनकी केवल देखरेख की जायेगी. इसके स्थान पर ग्रामीण विकास पर बल दिया जाएगा और वहां सभी आधुनिक सुविधाएँ विकसित की जायेंगी. 
  • कृषि उत्पादों के मूल्य उनकी सकल लागत के अनुसार निर्धारित कर कृषि क्षेत्र को स्वयं-समर्थ लाभकर व्यवसाय बनाया जायेगा जिससे कि भारतीय अर्थ व्यवस्था की यह मेरु सुदृढ़ हो. इससे खाद्यान्नों के मूल्यों में वृद्धि होगी, जिसको ध्यान में रखते हुए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की जायेगी.
  • विकलांगों और वृद्धों के अतिरिक्त शेष जनसँख्या के लिए चलाई जा रही सभी समाज कल्याण योजनायें बंद कर दी जायेंगी और इससे बचे धन के उपयोग से ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसाधन और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया जायेगा ताकि छोटे कृषकों को दूसरी आय के साधन प्राप्त हों और उन्हें अपनी कृषि भूमि विक्रय की विवशता न हो और भूमिहीनों को घर बैठे ही रोजगार उपलब्ध हों.
  • ६५ वर्ष से अधिक आयु के सभी वृद्धों को सम्मानजनक जीवनयापन हेतु पेंशन दी जायेगी, तथा राजकीय सेवा निवृत कर्मियों की सभी पेंशन बंद कर दी जायेंगी. साथ ही सेना और पुलिस के अतिरिक्त राजकीय सेवा से निवृत्ति की आयु ६५ वर्ष कर दी जायेगी.  
  • पुलिस और सेना के प्रत्येक कर्मी की कठोर कर्मों हेतु शारीरिक शौष्ठव का प्रति वर्ष परीक्षण अनिवार्य होगा जिसमें अयोग्य होने पर उन्हें सेवा निवृत कर दिया जायेगा. 
  • प्रांतीय विधान सभा सदस्यों के वेतन ५,००० रुपये प्रतिमाह, प्रांतीय मंत्रियों, राज्यपालों एवं संसद सदस्यों के वेतन ६,००० रुपये प्रतिमाह, केन्द्रीय मंत्रियों के वेतन ७,००० रुपये प्रतिमाह, तथा राष्ट्राध्यक्ष का वेतन ८,००० रुपये प्रतिमाह पर ५ वर्ष के लिए सीमित कर दिए जायेंगे. इसके अतिरिक्त इनके राजकीय कर्तव्यों पर वास्तविक व्ययों का भुगतान किया जाएगा अथवा निःशुल्क सुविधाएं दी जायेंगी.
  • राज्य कर्मियों के न्यूनतम एवं अधिकतम सकल वेतन ७,००० से १०,००० के मध्य कर दिए जायेंगे. इसके अतिरिक्त उन्हें कोई भत्ते देय नहीं होंगे. राज्य कर्मियों के लिए सभी आवासीय कॉलोनियां नीलाम कर दी जायेंगी और उन्हें निजी व्यवस्थाओं द्वारा जनसाधारण के मध्य रहना होगा. साथ ही कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के सभी पद समाप्त होंगे.   
  • राजनैतिक दलों को प्राप्त मान्यताएं और अन्य सुविधाएं समाप्त कर दी जायेंगी, तथापि वे स्वयं के स्तर पर संगठित रह सकते हैं. 
  •  देश में सभी प्रकार की आरक्षण व्यवस्थाएं समाप्त कर दी जायेंगी.
  • निजी क्षेत्र की सभी शिक्षण संस्थाएं बंद कर दी जायेंगी तथा राज्य संचालित सभी संस्थानों में सभी को निःशुल्क शिक्षा प्रदान की जायेगी. आवश्यकता होने पर नए संस्थान खोले जायेंगे. 
  • सेना देश की रक्षा के अतिरिक्त सार्वजनिक संपदाओं, जैसे वन, भूमि, जलस्रोत आदि के संरक्षण का दायित्व सौंपा जाएगा जिससे उस पर किये जा रहे भारी व्यय का सदुपयोग हो सके. इसके अंतर्गत सार्वजनिक संपदाओं पर व्यक्तिगत अधिकार के लिए सैन्य न्यायालयों में कार्यवाही की जा सकेगी. 
  • सभी धर्म, सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठानों एवं संस्थानों पर पूर्ण रोक लगा दी जायेगी और धर्म स्थलों को शिक्षा संस्थानों में परिवर्तित कर दिया जायेगा. सार्वजनिक स्तर पर प्रत्येक मनुष्य को केवल मनुष्य बन कर रहना होगा.        
हम जानते हैं कि इनमें से अनेक प्रावधानों का घोर विरोध होगा किन्तु यह सब राष्ट्र हित में होने के कारण बौद्धिक जन समुदाय पर जन साधारण को सुशिक्षित करने का भारी दायित्व आ पड़ेगा. आवस्यकता होने पर सेना की सहायता ली जायेगी. 

    सोमवार, 7 जून 2010

    बौद्धिक जन-समुदाय के समक्ष चुनौती

    किसी भी परिवर्तनशील समाज अथवा देश में लोगों के लाभ और हानियाँ उनकी व्यक्तिगत या सामूहिक स्थिति के सापेक्ष परिवर्तन की दिशा पर निर्भर करते हैं. यथा यदि देश पूंजीवाद की ओर बढ़ रहा होता है तो देश के पूंजीपति लाभान्वित होंगे किन्तु बौद्धिक लोगों और जन-साधारण के हितों को क्षति पहुंचेगी. किन्तु यदि देश का समस्त समाज एकीकृत है तो प्रत्येक परिवर्तन से सभी को एक समान लाभ होगा अथवा क्षति पहुंचेगी. जनतंत्र ऐसे ही एकीकृत समाज वाले देशों के लिए अभिकल्पित है और इसे अपनाने वाले प्रत्येक देश में एकीकृत समाज की अपेक्षा की जाती है. किन्तु भारत जैसे बहुपक्षीय एवं बहुरूपी समाज में प्रत्येक परिवर्तन का प्रभाव सभी पर एक समान होना संभव नहीं है. सभी लाभान्वित हों, इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति अथवा उनके समुदायों के सापेक्ष सभी क्षेत्रों में परिवर्तन किये जाएँ.

    इस संलेख के सन्दर्भ में हमारा अभिप्राय लोगों की बौद्धिक संपदा अथवा उसका अभाव है, इसलिए भारतीय समाज को हम इसी आधार पर वर्गीकृत करेंगे. बौद्धिकता के सन्दर्भ में विश्व इतिहास लोगों को दो वर्गों में रखता है - एक वर्ग अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए कठोर परिश्रम कर दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रगति करता है, जबकि दूसरा वर्ग अपनी मनोवैज्ञानिक, राजनैतिक और व्यावसायिक युद्धनीति का उपयोग करते हुए प्रथम वर्ग की प्रगति का अवशोषण करता है. प्रथम वर्ग सृजन करता है और दूसरा वर्ग उसका अवशोषण करता है और आनंद पाता है. ऐसा होना अपरिहार्य है क्योंकि एक दार्शनिक राजनीतिज्ञ नहीं हो सकता और एक वैज्ञानिक योद्धा नहीं हो सकता.

    विश्व के विकसित देशों में भी समाज ऐसे वर्गों में विभाजित होता है किन्तु वहां लेने और देने का संतुलन बना रहता है जिससे शोषण न्यूनतम होता है. इसका एक सटीक उदाहरण यह है कि इंग्लैंड के एक उपन्यास लेखक को करोड़ों पोंड की राशि अग्रिम मानदेय के रूप में प्राप्त हो जाती है जिसके कारण वह प्रकाशक अपनी प्रकाशन दक्षता और अपने निवेश से कई गुणित धन कमाता है. इसकी तुलना में, भारत में एक शीर्षस्थ लेखक को पुस्तक लिखने के बदले लगभग १०,000 रुपये तक प्राप्त होता है जबकि उसका प्रकाशक उसी पुस्तक से लाखों रुपये अर्जित करता है. भारत में सभी क्षेत्रों में कुछ ऐसा ही हो रहा है, क्योंकि यहाँ का समाज उपरोक्त प्रकार से वर्गीकृत है - दार्शनिक और व्यावसायिक वर्गों में.

    यहाँ हमारे लिए आवश्यक है कि हम सभ्यता और संस्कृति के अंतराल को समझें. सभ्य समाज में संतुलित शोषण होता है जबकि संस्कृत समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी शक्ति के अनुसार दूसरों का अविश्वास की सीमा तक भरपूर शोषण करता है. विकसित देश कुछ सीमा तक सभ्य हैं जब कि भारत दीर्घकालिक परतंत्रता के कारण संस्कृत है जहां शोषण ही जीवनधारा होता है. हम भारत-वासी अभी  तक उस दासता वाली मानसिकता से उबर नहीं पाए हैं.

    हमें अपनी दीर्घकालिक दासत्व संस्कृति से उबरने के लिए सभ्य होना होगा जो प्रक्रिया दो स्तरों पर संचालित होगी - व्यक्तिगत और सामाजिक. प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सभ्य बन सकता है किन्तु यदि समाज सभ्य न हुआ तो वह व्यक्ति संस्कृत समाज में अवांछित घोषित कर दिया जाएगा. इस के लिए देश के सभी नागरिकों को साथ-साथ सभ्य होना होगा ताकि राष्ट्र अपनी संस्कृति का परित्याग कर सभ्य बन सके. किन्तु भारत में ऐसा होना इस लिए संभव नहीं है क्योंकि यहाँ लोगों के शरीर और मन दोनों में अभाव व्याप्त है. इस अभाव के कारण हम व्यक्तिगत रूप में अपने चेहरों पर से संस्कृति का नकाब उतारने में असफल ही रहेंगे.

    इसलिए भारत की विवशता है कि देश में बौद्धिक शासन की स्थापना के लिए बलपूर्वक परिवर्तन किया जाये जिसके लिए आरम्भ में कुछ लोगों की निरंकुश स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाया जाए जिसे उनके व्यवहार में सम्यक परिवर्तन आने पर शनैः-शनैः शिथिल किया जाए. इससे अंततः सभी का सभ्य व्यवहार होने पर सभी को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की जा सकेगी. इस निरंकुश स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाना उन लोगों के लिए कष्टकर होगा जो अभी संस्कृत समाज में शोषण कर रहे हैं, इसलिए वे इसका डट कर विरोध करेंगे. अभी देश में इस प्रकार के लोगों की जनसँख्या लगभग १५ प्रतिशत है किन्तु ये राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप में सर्वाधिक शक्तिशाली हैं और देश की लगभग ४० प्रतिशत आर्थिक संपदा और १०० प्रतिशत राजनैतिक सत्ता के स्वामी बने हुए हैं. इसी संपदा और सत्ता के माध्यम से ये जनसाधारण पर अपना शिकंजा कसे रहते हैं.

    देश की ६० प्रतिशत जनसँख्या का इतना अधिक शोषण किया जा रहा है कि उनके समक्ष जीवन-मरण का प्रश्न मुंह बाए खड़ा रहता है जिसके कारण उन्हें इस विषय में कोई रूचि नहीं हो सकती कि देश में संस्कृत राजनैतिक शासन हो अथवा सभ्य दार्शनिक व्यवस्था. यह जनसँख्या दूसरों के मार्गदर्शन पर आश्रित रहती है और अभी राजनैतिक शासकों के चंगुल में है. तथापि इस विशाल जनसँख्या को उसके शोषण से अवगत किया जा सकता है जिससे कि वह वर्तमान राजनैतिक षड्यंत्र को समझ सके और परिवर्तन में अपनी भागीदारी बना सके. यही जनसँख्या खेतों और कल-कारखानों में श्रम करने के कारण देश की अर्थव्यवस्था की मेरु है, तथापि देश की केवल ३० प्रतिशत संपदा की स्वामी है. 

    इस प्रकार देश केवल २५ प्रतिशत जनसँख्या को बौद्धिक जनतंत्र में रूचि होने की संभावना है जो देश की अर्थ-व्यवस्था का सञ्चालन भी करती है तथा जिसकी बौद्धिकता का राजनीतिज्ञों द्वारा शोषण भी किया जा रहा है. इसलिए, यदि देश की दूसरी स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष किया जाता है तो देश की लगभग ३० प्रतिशत संपदा वाली इसी ३० प्रतिशत जनसँख्या को देश की ४० प्रतिशत संपदा की स्वामी केवल १५ प्रतिशत जनसँख्या से जूझना होगा. यह संघर्ष मूलतः मनोवैज्ञानिक होगा जिसमें बौद्धिक समुदाय का साथ ६० प्रतिशत सर्वाधिक पीड़ित जनसँख्या भी दे सकती है. 

    इस संघर्ष में खतरा बड़ा है किन्तु इसके संभावित लाभ खतरे से कई गुणित हैं जिसमें देश की ८५ प्रतिशत जनता लाभान्वित होगी तथा केवल १५ प्रतिशत जनसँख्या को सामान्य स्तर पर लाया जाएगा. वर्तमान शासकों द्वारा दुष्प्रचारित 'भारत महान', 'विश्वगुरु भारत', 'भारत प्रगति पथ पर' आदि इसी संघर्ष को रोकने के लिए है. जबकि वस्तुस्थिति यह है कि विश्व में भारत को कोई सम्मानित स्थान प्राप्त नहीं है, तथा विश्व की ३० प्रतिशत निर्धनतम जनसँख्या भारत में बसती है. यहाँ का प्रबुद्ध वर्ग विश्व भर में सस्ते मजदूरों के रूप में विख्यात है, जिसका उपयोग करके विकसित देश तेजी से विकास कर रहे हैं और भारत को उसका कोई लाभ प्राप्त नहीं हो रहा है. इस सबके लिए शासक वर्ग उत्तरदायी है जो स्वयं के शासन पर देश के कराधान का ४० प्रतिशत व्यय कर रहा है जबकि विश्व के अन्य देशों में यह केवल १० प्रतिशत है. 

    यदि बौद्धिक वर्ग इस मनोवैज्ञानिक क्रांति को नहीं अपनाता है तो निकट भविष्य में भारत में फ्रांस जैसी रक्त-रंजित क्रांति अवश्यम्भावित है जिसमें सत्ता परिवर्तन तो होगा किन्तु विनाश के बाद, और निश्चित रूप में यह भी नहीं कहा जा सकता कि नए सत्ताधारी कौन होंगे, जो कोई विदेशी भी हो सकते हैं जिससे देश पुनः परतंत्रता में जकड लिया जाएगा. आर्थिक रूप में भारत आज भी परतंत्र ही है यह परतंत्रता राजनैतिक भी हो सकती है.

    इस संलेख में देश की व्यवस्था के लिए रूपरेखा दी गयी है जिसपर गंभीर विचार मंथन की आवश्यकता है और भारत भविष्य निर्माण के लिए सार्थक कदम उठाये जाने की आवस्यकता है.

    रविवार, 18 अप्रैल 2010

    जमींदारी प्रथा की वापिसी और प्रतिकार उपाय

    विश्व भर में औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक विकास कार्यों के होते हुए भी भारत की अर्थ-व्यवस्था की मेरु आज भी कृषि ही है, साथ ही इसी से यहाँ की लगातार बढ़ती जनसँख्या जीवित बनी हुई है. कृषि भूमि के स्वामियों को दो वर्गों में रखा जा सकता है - कृषक और कृषि-स्वामी. कृषि व्यवसाय में उपज के आधार पर हानिकर स्थिति के कारण कृषकों की रूचि इसमें कम होती जा रही है, केवल विवशता शेष रह गयी है. दूसरी ओर भूमि के तीव्र गति से बढ़ते मूल्यों के कारण अन्य व्यवसायियों की रुच कृषि भूमि के क्रय में बढ़ रही है जिसके कारण भूमि कृषकों के हाथों से खिसकती जा रही है.

    कृषकों के पास कृषि भूमि के अभाव का दूसरा बड़ा कारण यह है भूमि स्वामित्व में कृषक के सभी पुत्रों का समान अधिकार होता है चाहे वे कृषि कार्य करते हों अथवा किसी अन्य व्यवसाय अथवा आजीविका साधन में लगे हुए हों. जो पुत्र कृषि कार्य न कर रहे होते हैं, इस प्रकार उन्हें आय के दो साधन उपलब्ध हो जाते हैं - उनका अपना व्यवसाय तथा कृषि भूमि से आय. इस कारण से कृषक सापेक्ष रूप में निरंतर निर्धन होते जा रहे हैं जबकि भूमि के अन्य स्वामी धनवान बनते जा रहे हैं. ये लोग अपनी सम्पन्नता का उपयोग प्रायः कृषि भूमि क्रय के लिए करते हैं. निर्धन कृषक भी इसका विरोध करने में असक्षम होते हैं और वे अपनी भूमि इन कृषि न करने वाले भू स्वामियों को अपनी भूमि विक्रय करते रहते हैं. इससे भी कृषि भूमि के स्वामित्व उन लोगों के हाथों में जा रहा है जो स्वयं कृषि नहीं करते और उसे कृषकों के माध्यम से मजदूरी पर करते हैं.

    इस नयी पनपती व्यवस्था से शीघ्र ही कृषि क्षेत्र में जमींदारी व्यवस्था पुनः स्थापित हो जायेगी जो स्वतन्त्रता के बाद सन १९५० में उन्मूलित की गयी थी. जमींदारी उन्मूलन का मुख्य उद्येश्य कृषकों को भू स्वामित्व प्रदान करना था किन्तु स्वतंत्र देश की शासन व्यवस्था ही इसके प्रतिकूल परिस्थितियां उत्पन्न कर रही है. देश की स्वतन्त्रता और व्यवस्था की यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि कृषि व्यवस्था अपने वांछित रूप में ६० वर्षों में ही दम तोड़ती प्रतीत हो रही है.

    स्वतंत्र भारत के संविधान में कृषि बूमि के स्वामित्व में उत्पन्न इस विकृति के दोनों कारणों का प्रतिकार करने के प्रावधान नहीं हैं  जो इसके खोखलेपन को उजागर करता है. जमींदारी व्यवस्था की वापिसी से देश की सामाजिक व्यवस्था चरमरा जायेगी और कृषि क्षेत्र के दुरावस्था से देश की अर्थ व्यवस्था भी दुष्प्रभावित होगी. समाज में निर्धनों और धनवानों के मध्य खाई गहरी होती जायेगी जिससे सामाजिक अपराधों में वृद्धि होगी. रक्त रंजित क्रांति भी नकारी नहीं जा सकती. इसलिए भूमि प्रबंधन में उक्त विकृति के प्रति तुरंत कारगर उपाय करने की आवश्यकता है.

    भूमि राष्ट्र की जल, वायु खनिज, आदि की तरह ही प्राकृत संपदा होती है, इस पर व्यक्तिगत स्वामित्व इसकी मूल प्राकृतिक व्यवस्था के प्रतिकूल है. इसलिए बौद्दिक जनतंत्र में समस्त भूमि को राष्ट्र के स्वामित्व में रखे जाने का प्रावधान है जो प्रत्येक उपयोक्ता को उसकी वास्तविक आवश्यकता के अनुसार समुचित कराधान पर उपलब्ध काराई जायेगी.

    रविवार, 7 फ़रवरी 2010

    वरीयता क्रम मत प्रणाली

    बौद्धिक जनतंत्र में सरकार के चुनाव के लिए नागरिकों को मताधिकार उपयोग हेतु एक विशिष्ट चुनाव प्रणाली का प्रतिपादन किया गया है, जिसे 'वरीयता क्रम मत प्रणाली' नाम दिया गया है. इस प्रणाली में प्रत्येक मतदाता किसी एक प्रत्याशी को अपना मत न देकर तीन प्रत्याशियों को अपना वरीयता क्रम प्रदान करता है. इन क्रमों के मूल्य निम्न प्रकार निर्धारित हैं -
    प्रथम वरीयता - ५ अंक
    द्वितीय वरीयता - ३ अंक, तथा
    तृतीय वरीयता - २ अंक.

    मतदान के पश्चात् प्रत्येक प्रत्याशी के वरीयता अंको का योग प्राप्त किया जायेगा और जो प्रत्याशी कुल अंको का ५० प्रतिशत से अधिक तथा प्रत्याशियों में सर्वाधिक अंक प्राप्त करेगा, वही विजयी घोषित होगा. इसके तीन लाभ अपेक्षित हैं -
    1. प्रत्याशियों में परस्पर सहयोग करने की भावना उभरेगी ताकि एक प्रत्याशी के प्रथम वरीयता मतदाता दूसरे प्रत्याशियों को अपनी अन्य वरीयता प्रदान कर सकें. अतः चुनावों में अंतर्कलह न्यूनतम होगी.
    2. प्रत्येक मतदाता को सुविधा मिलेगी कि वह तीन प्रत्याशियों का मूल्यांकन करे और किसी एक तक सीमित न रहे. 
    3. विजित प्रत्याशी का प्रबाव क्षेत्र सीमित न रहकर विस्तृत प्राप्त होगा.
    यद्यपि इस प्रणाली में एक बार की चुनाव प्रक्रिया में ही विजित प्रत्याशी को ५० प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का पूर्णतः अथवा अंशतः समर्थन अपेक्षित है, तथापि यह ५० प्रतिशत से न्यून होने पर चुनाव प्रक्रिया पुनः अपनाई जाएगी जिसमे केवल तीन प्रत्याशी हे मैदान में रहेंगे. इससे विजित प्रत्याशी का जनसमर्थन निश्चित रूप से व्यापक पाया जाएगा.

    यदि चुनाव मैदान में केवल दो ही प्रत्याशी रहते हैं तो वरीयता अंक इस प्रकार दिए जाएँगे -
    प्रथम वरीयता - 6 अंक, तथा 
    द्वितीय वरीयता - 4 अंक.

    जिससे कि विजित प्रत्याशी को एक बार में ही ५० प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त हो सकें, क्योंकि इस स्थिति में पुनः मतदान करना अव्यवहारिक होगा. . 

    शनिवार, 23 जनवरी 2010

    बौद्धिक जनतंत्र की प्राथमिकता तीन - न्याय

    बौद्धिक जनतंत्र की तीसरी प्राथमिकता सभी को निःशुल्क त्वरित न्यायप्रदान करना है जो स्वस्थ एवं शिक्षित नागरिकों के सुखी जीवन के लिए अनिवार्य है. स्वतंत्र भारत के के ६० वर्षों से अधिक की अवधि में न्याय उपलब्धि अधिक से अधिक दुर्लभ होती जा रही है, जो शासन के लिए शर्मनाक है.


    न्याय की त्वरित उपलब्धि न्याय प्रक्रिया का अभिन्न अंग है. अतः बौद्धिक जनतंत्र में प्रत्येक न्यायालय के लिए प्रत्येक विवाद में तीन माह की अवधि में न्याय प्रदान करना अनिवार्य किया गया है जिसका उत्तरदायित्व सम्बद्ध न्यायाधीश का निर्धारित किया गया है. ऐसा न होने पर न्यायाधीश को इस सेवा के अयोग्य  ठहराकर पद मुक्त किये जाने का प्रावधान है. 

    यदि देश अथवा समाज में अन्याय न हो तो किसी भी नागरिक को न्याय की आवश्यकता नहीं होगी, और देश अथवा समाज की व्यवस्था का दायित्व शासन का होता है. अतः अन्यायों को रोकना शासन का दायित्व है. यदि शासन इसमें असफल रहता है तो ही नागरिकों को न्याय माँगने की आवश्यकता होती है. नागरिकों को न्याय प्रदान करने के लिए उनसे किसी शूल की मांग किया जाना स्वयं एक अन्याय है. अतः बौद्धिक जनतंत्र में निःशुल्क न्याय प्रदान करना शासन का निर्धारित दायित्व है क्योंकि न्याय की आवश्यकता शासन दोष से ही व्युत्पन्न होती है. 

    न्याय का अर्थ होता है दंड व्यवस्था, जिस के लिए बौद्धिक जनतंत्र में कुछ विशिष्ट प्रावधान हैं -
    1. प्रकृति कारण-प्रभाव सिद्धांत पर कार्य करती है जिसमें प्रत्येक कारण का प्रभाव अवश्य होता है, अर्थात कोई भी कारण प्रभावहीन अथवा क्षम्य नहीं होता. बौद्धिक जनतंत्र की न्याय व्यवस्था भी इसी सिद्धांत पर कार्य करती है, तदनुसार कोई भी अपराध क्षम्य नहीं होगा. 
    2. अपराधी को दंड उसके द्वारा किये गए अपराध के अनुसार न दिया जाकर समाज में उसके दायित्व और अधिकार के अनुरूप निर्धारित है. यथा यदि कोई निम्न वर्गीय राज्यकर्मी रिश्वत लेता है तो उसे अल्प दंड दिया जायेगा किन्तु यदि ऐसा ही अपराध कोई उच्च पदासीन व्यक्ति करता है तो उसे इसके लिए अत्यधिक कठोर दंड दिया जायेगा. 
    3. न्यायाधीश समाज के विशिष्ट बुद्धिसम्पन्न एवं अधिकृत व्यक्ति होते हैं अतः उनका दायित्व भी सर्वाधिक होता है. अतः उनसे सर्वाधिक अपेक्षाएं की जाती हैं. यदि किसी न्यायाधीश का न्यायादेश उच्चतर न्यायाधीश द्वारा निरस्त अथवा उलटा जाता है तो यह पूर्व न्यायाधीश की अक्षमता मानी जायेगी और उसे न्याय करने के अयोग्य घोषित किया जाकर पदमुक्त किया जायेगा. साथ ही उच्चतर न्यायाधीश को पूर्वादेश को निरस्त किये जाने के विस्तृत कारण देने होंगे.
    4. न्यायालयों के न्याय-आदेशों पर समाज अथवा जन-माध्यम में खुली चर्चा की जा सकेगी ताकि समाज उनकी कार्य कुशलता की परख करता रहे तथा वे स्वयं भी सजग रहें. इसके साथ ही न्यायाधीशों के कोई विशेषाधिकार नहीं होंगे और उन्हें अपने प्रत्येक आदेश का अधर सिद्ध करना होगा. 
    5. बौद्धिक जनतंत्र मृत्युदंड का पक्षधर है और इसे अपराध रोकने के लिए आवश्यक मानता है. 
    इस प्रकार बौद्धिक जनतंत्र समाज में अपराधों को ही नहीं, अपराध प्रवृतियों को रोकने के कारगर उपाय करने के लिए कृतसंकल्प है. 

    शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

    बौद्धिक जनतंत्र में मताधिकार

    बौद्धिक जनतंत्र सभी वयस्क नागरिकों को एक समान मताधिकार नहीं देता अपितु यह अधिकार नागरिकों की शैक्षिक योग्यता एवं अनुभव पर निर्भर करता है. इस विषय में सर्व प्रथम हम उन वर्गों का उल्लेख करते हैं जिन्हें बौद्धिक जनतंत्र कोई मताधिकार नहीं देता.


    मताधिकार से वंचित वर्ग
    १. २५ वर्ष से कम आयु के नागरिक
    भारत में कुछ समय पहले तक मताधिकार की न्यूनतम सीमा २१ वर्ष थी और पुरुष विवाह की न्यूनतम सीमा थी १८ वर्ष. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री बनने पर मताधिकार की न्यूनतम आयु सीमा १८ वर्ष कर दी क्योंकि १८ वर्ष के बालक को राष्ट्रीय दायित्व निर्वाह के योग्य समझा गया. इसके साथ ही २१ वर्ष के बालक को व्यक्तिगत दायित्व निर्वाह के अयोग्य माना गया और विवाह की न्यूनतम सीमा २१ वर्ष कर दी गयी. ऐसा है स्वतंत्र भारत की राजनीती का खेल जिसमें १८ से २१ वर्ष आयु वर्ग को व्यक्तिगत दायित्व के योग्य और राष्ट्रीय दायित्व के योग्य बना दिया गया, क्योंकि राष्ट्रीय दायित्व के निर्वाह की किसी को कोई चिंता नहीं है. इस परिपेक्ष्य में बौद्धिक जनतंत्र में मताधिकार की न्यूनतम सीमा २५ वर्ष निर्धारित की गयी है क्योंकि राष्ट्रीय दायित्व को व्यक्तिगत दायित्व से कहीं अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है जिसके निर्वाह के लिए मताधिकारी का परिपक्व होना अनिवार्य है.

    २.  ७० वर्ष से अधिक आयु के नागरिक
    बौद्धिक जनतंत्र ७० वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक के ससम्मान जीवनयापन का दायित्व अपने ऊपर लेता है जिसके ऐसे सभी नागरिकों को एक समान सम्मानजनक पेंशन प्रदान की जायेगी. राजनेताओं को इस वर्ग के नागरिकों के मत पाने की लालसा से मुक्त करने के लिए बौद्धिक जनतंत्र इस वर्ग को कोई मताधिकार नहीं देता. स्वतंत्र भारत का स्पष्ट अनुभव है कि राजनेता मतों के लोभ में वर्गों को अनुचित लाभ प्रदान करने से नहीं चूकते.

    ३.  अशिक्षित व्यक्ति
    आधुनिक युग में किसी व्यक्ति का अशिक्षित होना शर्मनाक है - व्यक्तियों तथा शासन व्यवस्था दोनों के लिए. व्यक्ति का अशिक्षित होना सिद्ध करता है कि व्यक्ति अपने, समाज के तथा राष्ट्र के प्रति संवेदनशील नहीं है और न ही इसके योग्य है. भारत में न्यूनतम सुप्रमाणित शिक्षा हाईस्कूल अथवा कक्षा दस है. इससे कम शिक्षित व्यक्ति को अशिक्षित वर्ग में रखते हुए बौद्धिक जनतंत्र ऐसे किसी नागरिक को मताधिकार नहीं देता.

    ४. अपराधी व्यक्ति
    बौद्धिक जनतंत्र समाज एवं राजनीति के शोधन के लिए अपराधियों को जनतांत्रिक प्रक्रिया से दूर रखने के उद्देश्य से ऐसे किसी व्यक्ति को मताधिकार नहीं देता जो किसी न्यायालय द्वारा अपराधी घोषित किया जा चुका है जब तक कि वह उच्चतर न्यायालय द्वारा आरोप से मुक्त नहीं कर दिया जाता.  अपराधों की रोकथाम तथा राजनीति में अपराधियों की घुसपैठ रोकने के लिए यह आवश्यक समझा गया है.

    ५. राज्यकर्मी
    राज्यकर्मी शासन-प्रशासन का अंग होने के कारण सत्ता में भागीदार होते हैं और राज्य से वेतन पाते हैं. स्वतंत्र भारत में यही वर्ग राजनेताओं की सर्वाधिक अनुकम्पा का पात्र बना रहा है क्योंकि प्रत्येक राजनेता इस वर्ग के मत पाने के लिए इन्हें प्रसन्न करता रहता है क्योंकि ये संगठित होते हैं तथा जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. इन दोनों दृष्टियों से बौद्धिक जनतंत्र राज्यकर्मियों को मताधिकार प्रदान नहीं करता.

    ६. मानसिक रोगी
    मानसिक रोगी उचित-अनुचित का निर्णय करने में असक्षम होता है इसलिए राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को भी नहीं समझ सकता. इसलिए बौद्धिक जनतंत्र में ऐसे प्रमाणित व्यक्तियों को मताधिकार से वंचित रखने का प्रावधान है.


    ७. तीन अथवा अधिक संतान उत्पन्न करने वाले युगल
    भारत की अनेक समस्याओं में से सर्वाधिक विकराल समस्या निरंतर बढ़ती हुई जनसँख्या है. यक प्राकृत तथा कृत्रिम दोनों कारणों से बढ़ रही है. ध्यान देने योग्य कृत्रिम कारण यह है कि कुछ जातियां तथा वर्ग जनतंत्र में राजनैतिक सत्ता हथियाने के लिए अपने मतों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ा रही हैं और इस कारण से इन्हें अधिकाधिक राजनैतिक शक्ति एवं संरक्षण प्राप्त होने लगा है. अत्यधिक जनसंख्या देश के विकास को भी दुष्प्रभावित कर रही है. इस समस्या के निदान के लिए बौद्धिक जनतंत्र ऐसे प्रत्येक युगल को मताधिकार से वंचित करता है जो ३ या अधिक संतानों को उत्पन्न करता है.

    ८. भिक्षु

    भिक्षा मांगकर जीवन यापन करने वाले व्यक्ति समाज के लिए अभिशाप होते हैं तथा बौद्धिक जनतंत्र उन्हें किसी सामाजिक अथवा राष्ट्रीय दायित्व निर्वाह के योग्य नहीं मानता. साधू, सन्यासी, संत, भिखारी, पुजारी, धर्म-प्रचारी, आदि को इसी वर्ग में रखा गया है.

    मत-मान
    इसके बाद हम आते हैं शिक्षा एवं अनुभव के आधार पर मताधिकार प्रदान करने के प्रावधान पर. बौद्धिक जनतंत्र शिक्षित व्यक्तियों को तीन वर्गों में रखता है - हाईस्कूल तथा इंटर शिक्षित अथवा समकक्ष, स्नातक तथा स्नातकोत्तर शिक्षित अथवा समकक्ष, एवं व्यावसायिक रूप से शिक्षित अथवा समकक्ष. अनुभव के आधार पर २५-४५ आयु वर्ग तथा ४६-७० आयु वर्ग.  बौद्धिक जनतंत्र इन वर्गों को निम्न प्रकार से अंक निर्धारित करता है -
    हाईस्कूल तथा इंटर शिक्षित अथवा समकक्ष : ०.५ अंक,
    स्नातक तथा स्नातकोत्तर शिक्षित अथवा समकक्ष : १.० अंक,
    व्यावसायिक रूप से शिक्षित अथवा समकक्ष : १.५ अंक,
    २५-४५ आयु वर्ग : ०.५ अंक, तथा
    ४६-७० आयु वर्ग : १.० अंक

    इस प्रकार प्रत्येक मताधिकारी को १, १.५, २ अथवा २.५ अंक प्राप्त होते हैं जो उसके मत का मान होगा. बौद्धिक जनतांत्रिक चनाव प्रक्रिया में प्रत्याशियों को प्राप्त मतों में उनके प्रत्येक मतदाता के मत में इस मान का गुणन किया जाकर ही उन्हें प्राप्त मतों की गणना की जायेगी. इस प्रावधान से शिक्षा को बढ़ावा मिलाने के साथ-साथ शासन संचालन में बौद्धिक गुणता का बीजारोपण होगा जिससे देश को अच्छे व्यक्तियों की सरकार प्राप्त होगी.

    इस  सबका स्पष्ट उद्देश्य यह है कि बौद्धिक जन्तर में सरकार चुने जाने की प्रक्रिया जनतंत्र की तरह केवल संख्या-आधारित न रहकर गुण-आधारित होगी. यही इस देश की समस्याओं के समाधान का मार्ग है.