शुक्रवार, 20 जून 2014

श्रीमान प्रधानमंत्री जी

आपके प्रधान मंत्री बनने को लगभग एक माह होने जा रहा है, किन्तु महंगाई, भृष्टाचार, बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर अभी तक सरकार ने अपनी इच्छाशक्ति भी नहीं दर्शाई है। सवा करोड़ भारतीयों के जीवन जीवन स्तर में सुधार तो बहुत दूर की बात है। गंगा की स्वच्छता योजना और काले धन पर जाँच दल जैसे बड़े लोगों के वैभवशाली कदम तो पूर्व की सरकारों ने भी उठाये थे जिन पर गरीब भारतीयों की गाढ़े पसीने की कमाई के हजारों करोड़ खर्च करने के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला। अब कुछ सकारात्मक होगा इसके कोई आसार नहीं लगते।


भारत में लगभग 1600 वर्ष पूर्णतः अथवा अंशतः  बर्बर विदेशी शासन और स्वतंत्रता के बाद देशी कुशासन ने भारतीयों की अस्मिता को नष्ट-भृष्ट कर दिया है, अतः गुणात्मक सुधार के लिए आमूल-चूल परिवर्तनों की आवश्यकता है। किसी भी देश अथवा समाज में गुणात्मक सुधार राजनेता, अभिनेता  अथवा धार्मिक नेता नहीं करते जिन्हें आप अपना बल माने बैठे हैं। इसके लिए राजसत्ता को अराजनैतिक विद्वत जनों के आश्रय की आवश्यकता होती है। आप राज-सत्ता मद में चूर इस कटु सत्य से दूर भाग रहे हैं। विविधताओं और विषमताओं से परिपूर्ण विशाल भारत का शासन अपेक्षाकृत समरस एवं लघु गुजरात के शासन से पूर्णतः भिन्न है।

गुणात्मक सुधार के मूलमंत्र

लोगों के जीवन स्तर में सुधार के लिए उन्हें चाहिए स्वास्थ, शिक्षा और न्याय, जो व्यवस्थाएं भारत में पूरी तरह ठप कर दी गयीं हैं। अब ये केवल संपन्न लोगों की पक्षधर बना दी गयी हैं। फलस्वरूप देश की 90 प्रतिशत जनसँख्या रोगी है, अस्पतालों में भरी भीड़ है किन्तु चिकित्सा नगण्य है। 70 प्रतिशत जनसँख्या अर्धशिक्षित है जिनमें 30 प्रतिशत निरक्षर हैं, सरकारी स्कूल-कॉलेज समय व्यतीत करने के क्लब बन गए हैं।सामान्य व्यक्ति को जीवन भर में न्यायिक निर्णय पाना असंभव है, जो अंततः धनाढ्य के पक्ष में ही होता है।

भारत के समाज की आवश्यकता है की ये तीनों व्यवस्थाएं शासन द्वारा सार्वजनिक सेवाएं मानी जाएँ, इनका व्यवसायीकरण प्रतिबंधित हो, और सभी को एक समान एवं निःशुल्क उपलब्ध हों। तभी देश की समग्र जनशक्ति विकास में भागीदार और सहयोगी होगी।

एक अर्धशिक्षित व्यक्ति को शिक्षा क्षेत्र के सर्वोच्च पद पर बैठा कर आपने दर्शा दिया है कि आपकी दृष्टि में जनसाधारण को शिक्षित करने का कोई महत्व नहीं है। इससे आप नेहरू परिवार के दृष्टिकोण के समर्थक सिद्ध होते हैं।

भूमि प्रबंधन

राष्ट्र की सर्वोच्च सम्पदा उसके नागरिकों का राष्ट्र-प्रेम होता है। जिन नागरिकों के पास राष्ट्र-भूमि पर पैर रखने भर को भूमि न हो उनसे राष्ट्रप्रेम की अपेक्षा कैसे की जा सकती है जबकि अनेक दूसरों के पास सैकड़ों एकड़ भूमि हो, जबकि भूमि जल और वायु की तरह एक प्राकृत संसाधन है, यह प्रत्येक नागरिक को उसकी मूल आवश्यकतानुसार उपलब्ध होनी चाहिए।

भारत में भू-स्वामित्व के सापेक्ष सदैव विशाल विषमता रही है। लगभग 50 प्रतिशत जनसँख्या भूमिहीन रही है और आज भी है। किन्तु अब जीवनयापन के लिए भूमि की अनिवार्यता नहीं रह गयी है, आजीविका के अनेक नए स्रोत विकसित कर लिए गए हैं। तथापि वांछित स्थान पर अपना घर बनाने का स्वप्न प्रत्येक परिवार देखता है, किन्तु भूमि उपलब्ध न होने के कारण इस स्वप्न को साकार नहीं कर सकता।

भारत का भूमि-प्रबंधन ऐसा होना चाहिए जिससे प्रत्येक परिवार को अपना घर बनाने के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध हो, जो समतापरक हो, तथा जो नागरिकों में राष्ट्रप्रेम की भावना विकसित कर सके। बौद्धिक जनतंत्र की संकल्पना में इस प्रकार के भू-प्रबंधन पर व्यापक विमर्श किया गया है। इसके अंतर्गत समस्त भूमि राष्ट्र के स्वामित्व में होगी, भूमि के निजी स्वामित्व एवं क्रय-विक्रय समाप्त होंगे। प्रत्येक परिवार को उसके वांछित स्थान पर एक भूखंड निःशुल्क प्रदान किया जायेगा, जिसे कभी भी शासन को वापिस करके अन्यत्र भूखंड प्राप्त किया जा सकेगा। अन्य उपयोगों के लिए भूमि मांग के अनुसार शासन द्वारा किराये पर दी जाएगी। ऐसी भूमि भी केवल शासन को हस्तांतरित की जा सकेगी।

गंगा स्वच्छता

गंगा स्वच्छता अभियान आपकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से जुड़ा है, इसलिए आपके मंत्रीगणों ने इस पर बिना विचार तुरंत निर्णय लिए हैं। इस योजना के अनुसार गंगा तटों पर प्रत्येक 100 किलोमीटर पर एक पर्यटन केंद्र निर्मित किया जायेगा। यह गंगा के लिए घातक सिद्ध होगा, जो अभी भी अनेक ग्रामों, कस्बों और नगरों की समीपता के कारण सघन रूप में प्रदूषित है। जितने अधिक लोग अथवा कारोबार गंगा के तटों पर पहुंचेंगे, गंगा उतनी ही अधिक मैली होगी। अतः गंगा जलधारा की स्वच्छता के लिए तटों को यथासंभव निर्जन करने की आवश्यकता है जिनपर यदाकदा सुव्यवस्थित मेले ही आयोजित किये जाने चाहिए।

The Ganges

इसके लिए यह आवश्यक है कि गंगा  मुख्य धारा के दोनों और न्यूनतम 500 मीटर चौड़ी हरित पट्टिकाएं रोपित कर दी जाएँ। इससे 5 वर्ष बाद गंगा स्वयं अपने रख-रखाव के लिए धन अर्जित करने लगेगी जिसका उपयोग हरित पट्टियों एवं गंगा तटों की स्वच्छता के लिए किया जाये। 

गंगा रेत पर राजनैतिक-प्रशासनिक दुराचार 

गंगा की जलधारा अपने साथ निरंतर रेत लेकर आती है जिसे वह अपने तल तथा तटों पर जमा करती जाती है। शीघ्र ही यह राशि इतनी विशाल हो जाती है कि धारा प्रवाह अवरुद्ध होने की सम्भावना बन जाती है, यदि इस रेत को वहां से न हटाया जाता रहे। भवन निर्माण की दृष्टि से यह रेत उच्च कोटि का होता है। 

गंगा से 100 किलोमीटर दूरी तक रहने वाले लोग सनातन काल से इस रेत का उपयोग अपने भवन निर्माण हेतु करते रहे हैं, जिसके माध्यम से वे अपरोक्ष रूप में गंगा को अपने निर्धारित पथ पर बनाये रखते हैं। इस से किसी भी प्रकार की पर्यावरण की समस्या उत्पन्न नहीं होती। इसके अतिरिक्त भवन निर्माण एक विकास-परक गतिविधि है, इसलिए भी वांछनीय। है 

गंगा धारा के पर्वतीय खण्डों में रेत के साथ-साथ विशाल शिलाएं और पत्थर भी बह कर आते रहते हैं। कुछ व्यवसायी इन इन शिलाओं और पत्थरों का इतना अधिक दोहन करने लगे जिससे धारा पथ बदलने लगे और पर्यावरणी समस्याएं उठने लगीं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने गंगा के इस दोहन को नियमित एवं सीमित रखने के आदेश दिए, किन्तु इसे पूर्णतः प्रतिबंधित कदापि नहीं किया। 

सर्वोच्च न्यायलय के आदेश का अनुचित लाभ उठाने के लिए उत्तर प्रदेश शासन-प्रशासन ने गंगा से रेत उठाने को पूर्णतः अवैध घोषित कर रखा है। इससे लोगों को अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिए स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को रिश्वत देने की विवशता बन गयी है। उक्त व्यवस्था से पूर्व लोगों को जो रेत राशि 150 रुपये में मिल जाती थी, उसके लिए अब 500 रुपये चुकाने पड़ते हैं। यह अतिरिक्त व्यय शासन-प्रशासन को रिश्वत की भेंट चढ़ रहा है। इससे जहाँ एक ओर भृष्टाचार और महंगाई बढे हैं, वहीँ दूसरी ओर भवन निर्माण कार्य मंद हुए हैं, विकास गति अवरोधित हुई है। 

अतः केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय का कर्त्तव्य बन जाता है कि गंगा धारा से रेत उठाने के लिए स्पष्ट नीति निर्धारित की जाये जिसे राज्यों के माध्यम से लागू किया जाये। यही सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का आशय है।    

उत्तर प्रदेश शासन की बर्खास्तगी 

चुनाव प्रचार के दौरान आपके घनिष्ठतम सहयोगी अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के लोगों को वचन दिया था कि केंद्र में मोदी सरकार बनते ही उत्तर प्रदेश के भृष्ट और अकुशल शासन को बर्खास्त कर दिया जायेगा।  इस वचन के कारण उत्तर प्रदेश की त्रस्त जनता ने आपको भारी विजय प्रदान की थी। किन्तु आप शासक होने के मद में उस वचन को भूल गए हैं जो प्रदेश के लोगों के साथ कृतघ्नता है। अतः तुरंत आवश्यकता है कि उत्तर प्रदेश की वर्त्तमान सरकार को बर्खास्त कर प्रदेश में विधान सभा चुनाव कराये जाएँ, अंतरिम अवधि के लिए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाये। 

ऑनलाइन शासन व्यवस्था 

आप इ-गवर्नेंस के पक्षधर हैं, किन्तु आप शायद यह नहीं जानते हैं की देश की 70 प्रतिशत जनसँख्या ऐसे ग्रामों में रहती जहाँ इंटरनेट सुविधा लोगों की पहुँच के बाहर है। केंद्रीय प्रतिष्ठान बी एस एन एल के अधिकारी एवं कर्मी इतने अधिक भृष्ट एवं असक्षम हैं कि उनपर निर्भर करना आत्महत्या के समान है।  मैं स्वयं 3 वर्ष इस प्रतिष्ठान का ग्राहक रहा हूँ और अपने इंटरनेट बिल तीन गुने तक देता रहा हूँ। सर्वोच्च स्तर तक शिकायत करता रहा हूँ किन्तु भृष्ट व्यवस्था को पराजित नहीं कर सका और मुझे अपना सम्बन्ध विच्छेद कराना पड़ा। देश के लोगों के लिए अभी इस भृष्ट प्रतिष्ठान का कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। मोबाइल संचालक लोगों की इस विवशता का पूरा व्यावसायिक एवं अनुचित लाभ उठा रहे हैं।