मंगलवार, 24 जून 2014

नमो : प्रधान मंत्री पद पूर्व और पाश्च

भारत विगत 5 वर्षों में आवश्यक वस्तुओं के मूल्य, सरकारी तंत्र में भृष्टाचार और बेरोजगारी तीव्र गति से बढ़ते रहे हैं और शासक-प्रशासक जनसामान्य की विवशता पर अपने वैभवों में वृद्धि करते रहे। एक और सत्तासीन राजनेता, राज्यकर्मी और बड़े व्यवसायी घरानों और दूसरी और शेष जनसँख्या में निरंतर बढ़ती आर्थिक दूरी ने मानवीय मूल्यों में भी आमूल-चूल परिवर्तन कर दिए। जहाँ वैभवशाली वर्ग जनसामान्य की दृष्टि में राक्षसीय प्रतिमान बन गया, वहीँ दूसरी ओर वैभवशाली वर्ग की दृष्टि में निस्सहाय त्रस्त जनता अधीनस्थ पशु-मानव समुदाय मानी जाने लगी जिसका व्यापक शोषण प्रथम वर्ग के वैभवों के लिए प्रचलन बन गया। ऐसी स्थिति में जनसामान्य बौखला गया और वैभवशाली वर्ग से विद्रोह को अधीर हो गया।


नमो गुजरात के मुख्यमंत्री थे, पद, प्रतिष्ठा और वैभव हेतु पर्याप्त साधन थे, शीर्षस्थ औद्योगिक घरानों से निकटता थी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रशिक्षण, अनुभव और प्रदर्शनीय मुखौटा था। उन्होंने पाया कि परिस्थिति जनता की विद्रोही भावना का लाभ उठाने हेतु परिपक़्व है। अपने संसाधनों और संपर्कों के माध्यम से स्वयं को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करा दिया। चुनाव 2014 में जनता ने नमो को लगभग सर्वसम्मति से देश का प्रधानमंत्री बना दिया। पंजाब, बंगाल, तमिलनाडु, और पूर्वांचल के असहमत स्वर शेष भारत से उठे गुबार में दब गए।

प्रधानमंत्री पद पाने के एक माह पूर्व के नमो और अब एक माह पाश्च के नमो में भूमि और आकाश का अंतराल आ गया। चुनाव से पूर्व वे महंगाई, भृष्टाचार और बेरोजगारी के प्रबल आलोचक थे किन्तु अब वे इन्ही का अनुपालन ठीक उसी पैमाने पर कर रहे हैं जैसा कि पूर्व शासक कर रहे थे। तब वे स्वयं को जनता के विनम्र सेवक के रूप में प्रस्तुत करते थे, अब उन्हें जनसामान्य की दुर्गन्ध सताने लगी है। स्वयं को विशाल भारत के परम वैभवशाली निरंकुश मुग़ल सम्राट के रूप में स्थापित कर चुके नमो प्रत्येक उस वस्तु और वैभव को प्राप्त करने को आतुर हैं जो कभी किसी सम्राट ने भी कभी प्राप्त न किया हो। इसका संकेत उन्होंने अपने राज्याभिषेक व्यवस्था से ही दे दिया था जो अब तक के विश्व के तमाम राज्यभिषेकों से अधिक वैभवपूर्ण था।अब उन्हें चाहिए वह वेशभूषा जैसी कभी किसी सम्राट ने भी न पहनी हो, आवागमन के लिए वैसी कार जैसी किसी ने भी प्रयोग न की हो, और जनता की दुर्गन्ध से बचने के लिए वैसा सुरंग मार्ग जिसकी कोई कल्पना भी न कर सके।

नमो को अब परम प्रिय हो गयी है वह प्रभुसत्ता जो तुच्छतम को श्रेष्ठतम, और श्रेष्ठतम को धूलधूसरित कर सकें। इसके लिए वे देश की विधिक व्यवस्था को ध्वस्त करने में ही अपनी शान समझते हैं। इस प्रभुसत्ता के मद में उन्होंने अर्धशिक्षित व्यक्ति को शिक्षा क्षेत्र के सर्वोच्च पद से महिमामंडित किया है। देश के प्रतिष्ठित विद्वान और शिक्षाशास्त्री अब उस व्यक्ति के समक्ष नतमस्तक होंगे जो उनके शिष्य बनने के योग्य भी नहीं है। इसी से नमो को परम शक्तिशाली होने का मद आनंदित करता रहेगा।

उच्च पदासीन नृपेन्द्र मिश्र अपने पद पर निष्ठां के साथ कार्य करें इसके लिए विधिक व्यवस्था है कि वे पदमुक्त होने के दो वर्षों तक कोई शासकीय पद प्राप्त नहीं करेंगे। सर्वशक्तिशाली नमो को ऐसे विधान भंग करने में आनंद प्राप्त होता है, वे अध्यादेश के माध्यम से नृपेन्द्र मिश्र को शासकीय पद प्रदान कर अपना स्वामिभक्त निकटतम सेवक बनाते हैं, जबकि विशाल भारत में ऐसी ही सुयोग्यता वालें सैंकड़ों जनसेवक उपलब्ध थे। 

जनता पर महंगाई की और अधिक मार जिसका विरोध करते हुए वे पदासीन हुए हैं अब उन्हें महंगाई बढ़ाना सत्तामद के बोध का आनंद प्रदान करने के लिए अनिवार्य हो गया  है। डीजल की मूल्य वृद्धि की गयी जिसके महंगाई वृद्धि में दूरगामी परिणाम होंगे। जनसामान्य की यात्रा के साधन रेलगाड़ियों के किराये बढ़ाये गए क्योंकि देश का खज़ाना खाली है। किन्तु यह अभाव देशभक्ति का दिखावा करने वाले सत्तासीन व्यक्तियों को अपने वैभव सीमित करने की प्रेरणा नहीं देता, जनता जो है ऐसे बलिदानों के लिए।

और आज जनजीवन में अल्प मधुरता लाने वाली चीनी के मूल्य बढ़ाने की व्यवस्था कर दी गयी जिससे कि चीनी उद्योग के संपन्न व्यवसायी, जिनमें शरद पंवार और अजित सिंह जैसे पूर्व मंत्री सम्मिलित हैं, लाभान्वित हो सकें।  इससे भी आगे उन्हें सार्वजनिक धन बिना किसी ब्याज के प्रदान किया जायेगा। चीनी पर आयात शुल्क 15 से 40 प्रतिशत कर दिया गया है जिससे चीनी के खुदरा मूल्य में 4 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि होकर यह लगभग 11 प्रतिशत अधिक महँगी हो गयी है।

चीनी महंगाई का शुभ कार्य रामविलास पासवान के माध्यम से संपन्न हुआ जो मंत्री पद प्राप्ति के लिए शरद पंवार और अजित सिंह की तरह किसी से भी कोई भी समझौता करने को सदैव आतुर रहे हैं। शासन किसी भी पक्ष का क्यों न हो, पासवान कभी मंत्री पद से दूर नहीं रहे। उनके जीवन में आदर्शों का कोई मूल्य नहीं है। अब वे नमो के प्रिय अनुयायी हैं जो कुछ समय पूर्व सोनिया-राहुल की पादपूजा किया करते थे। अवसरवादिता उनकी रग-रग में बसी है, चीनी व्यवसायी शरद पंवार और अजित सिंह की ही तरह।  

पदासीन होने के पूर्व युग के सत्तासीन जिन्हें निरंतर कोसते हुए वे पदासीन हुए हैं, अब उनके लिए सुपात्र बन गए हैं। उनसे गले मिलते रहना नमो को सकून पहुंचता है। उनके दुष्कर्मों के विषय में एक शब्द कहना भी नमो को दुःख पहुंचाता है। देश में दालों का नकली अभाव रच कर उनके मूल्यों को औसतन 16 रुपये प्रति किलोग्राम से 100 प्रति किलोग्राम पर लाने वाले शरद पंवार अब नमो को अच्छे लगने लगे हैं, क्योंकि वे शासक परंपरा जनता के शोषण में सर्वदा अग्रणी रहे हैं। जनशत्रु सोनिया और मुलायम सिंह अब नमो के स्वजन हैं।

नमो के लिए भृष्टाचार शासकों की वैभवशाली परंपरा है, दुर्गन्धमय जनता के लिए वे उस परंपरा को भंग नहीं करेंगे अपितु उसे नित नए रूपों में आगे बढ़ाएंगे। चीनी की महंगाई द्वारा इसी परंपरा को एक अतीव नूतन रूप में कार्यान्वित किया गया है। सोनिया गांधी और नमो अब एक ही घाट पर जलपान करने लगे हैं। समझौते में कांग्रेस स्मृति ईरानी के अपनी शिक्षा के बारे में झूंठे शपथ पत्र के मामले पर चुप रहेगी, तो भाजपा वाड्रा मामले में मौन साधेगी। झूंठ, धोखाधड़ी और जनशोषण की महान शासकीय परंपरा बनी रहनी चाहिए।
प्रदर्शनवादी कृष्ण 
धर्म और कर्म के अनुयायियों में सदा से टकराव रहा है।  धर्म असत्य प्रदर्शन पर आधारित होता है, जबकि कर्म कठोर परिश्रम पर। नमो की एक माँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक धर्म संगठन है। झूंठे प्रदर्शन के गुण नमो में कूट-कूट कर भरे हैं। व्यक्तिगत रखरखाव और उसके प्रदर्शन में ही ऐसे व्यक्ति की समस्त ऊर्जा व्यय होती रहती है, उसके पास सकारात्मक कार्य के लिए कोई संसाधन शेष नहीं रहता। कर्मावलम्बी सर्वश्री लाल बहादुर शास्त्री और सरदार पटेल के पास निजी भव्यता के प्रदर्शन के लिए कोई समय ही नहीं था। कर्मवादी राम सादगी के साथ शांत भाव से कर्म में तल्लीन रहते थे जबकि धर्मवादी कृष्ण अपना पूरा समय स्वयं को गौरवान्वित करने में ही लगाते थे, जिसके लिए चाहे महाभारत युद्ध ही क्यों न कराना पड़े।

नमो के मन में विगत एक माह में जनहित का केवल एक विचार जागृत हुआ था - केंद्रीय कार्यालयों में ६ दिन का सप्ताह करने का, किन्तु इसमे स्वयं को महिमामंडित करने का कोई भाव निहित नहीं पाया गया। इस पर नमो ने नृपेन्द्र मिश्र की नियुक्ति वाली दृढ़ता नहीं दर्शाई और इसे उदय स्तर पर ही अस्त कर दिया।