सोमवार, 28 जून 2010

पुलिस पर चर्चा का खुला आकाश

 इसी संलेख पर मेरे एक आलेख 'अपराध और चिकित्सा सेवा' पर ग्राम्या उपनामित एक भारत पुत्री ने एक टिप्पणी की थी जिसमें पुलिस प्रशिक्षण पर प्रश्न उठाया था. मैंने वह टिप्पणी उत्तर प्रदेश पुलिस के उप महा निरीक्षक (प्रशिक्षण) श्री जसवीर सिंह को विचारार्थ भेज दी थी. सूचनार्थ पुनः बता दूं कि श्री जसवीर सिंह इंडिया रेजुविनेशन इनिशिएतिव से सम्बद्ध हैं और देश की स्थिति से चिंतित ही नहीं इसमें गुणात्मक सुधार हेतु प्रयासरत हैं. मुझपर उनका बड़ा उपकार है - उन्होंने मेरी गाँव में गुंडों के साथ संघर्ष में अभूतपूर्व सहायता की है. प्रिय ग्राम्या की उक्त टिप्पणी और श्री जसवीर सिंह जी का प्रत्युत्तर नीचे दिए जा रहे हैं, ताकि श्री सिंह द्वारा वांछित विषय पर प्रबुद्ध पाठक चर्चा कर सकें और राष्ट्र हित में अपना योगदान कर सकें.   

ग्राम्या की टिप्पणी :
इस देश का आम आदमी पुलिस के पास अपनी समस्या लेकर जाने से डरता है। यदि वह आम औरत हो तो यह डर और भी बढ़ जाता है। क्या पुलिस की ट्रेनिंग में यह नहीं सिखाया जाता कि पुलिस को जनता के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए? हमारी पुलिस अभी भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रसित है। धीरे-धीरे वह आम जनता में अपना विश्वास खो चुकी है। विशेषकर ग्रामीण इलाके के लोगों के साथ पुलिस का व्यवहार और भी आपत्तिजनक होता है। देश के कई हिस्सों में इस व्यवस्था के प्रति बढ़ रहे असंतोष को देखते हुए भी इन्हें आत्ममंथन की ज़रूरत महसूस नहीं होती।

श्री जसवीर सिंह  का प्रत्युत्तर :
प्रिय राम राम बंसल जी,
                                          मैं आप से सहमत हूँ । यह भी देखना होगा की ऐसे कैसे हुया कि गांधी जी ने आजादी के बाद की  पुलिस कैसे होगी के विषय में कहा था कि मैं अपने देश की पुलिस को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में देखना चाहता हूं। लेकिन ऐसे क्यों हुया की पुलिस में आजादी के बाद कोई परिवर्तन नहीं आया या नहीं लाया गया। इस पर विचार करिएगा और मुझे भी बताईएयगा। 
आप का धान्यवाद,
जसवीर

मैं इस चर्चा के आरम्भ में यह कहना चाहूँगा कि गांधीजी ने उक्त इच्छा व्यक्त की थी किन्तु किसी ने उनकी इच्छा पर ध्यान नहीं दिया, विशेषकर नेहरु ने जिन्होंने स्वतन्त्रता के बाद देश के शासन की बागडोर संभाली थी. इस अवहेलना दूसरा बड़ा कारण यह था कि देश के लिए स्वतन्त्रता की मांग करने वाले लोगों ने स्वतन्त्रता से पूर्व कभी इस विषय पर चिंतन एवं विचार-विमर्श नहीं किया कि वे स्वतन्त्रता के बाद इस देश को कैसे चलाएंगे. अतः स्वतन्त्रता प्राप्ति पर इधर-उधर से नक़ल कर एक फूहड़ संविधान भारत पर थोप दिया गया जो भारत के जनमानस के अनुकूल सिद्ध नहीं हो पाया है.

वस्तुतः भारतीय जनमानस जनतांत्रिक शासन के लिए उपयक्त न तो तब था, न ही आज तक बन पाया है, और न ही इसका कोई प्रयास किया गया है. इसी कारण से भारत को एक नयी शासन व्यवस्था की आवश्यकता है जिसे मैं बौद्धिक जनतंत्र कहता हूँ जिसमें देश की शासन व्यवस्था में बौद्धिक सुयोग्यता को आधार बनाया जाए और ऐसे प्रावधान हों कि प्रत्येक नागरिक को एक समान उत्थान के अवसर उपलब्ध हों. इसके लिए स्वास्थ सेवाएँ, शिक्षा और न्याय व्यवस्था पूरी तरह निःशुल्क हों. भूमि पर निजी स्वामित्व समाप्त हो तथा प्रत्येक नागरिक परिवार को आवास हेतु निःशुल्क भूमि प्रदान की जाये ताकि देश की इस प्राकृत संपदा पर सभी को पाँव धरने का सम्मान प्राप्त हो सके.

आगे निवेदन हैं कि सभी प्रबुद्ध जन इस विषय पर गंभीरता के साथ विचार करें, और अपने सुझाव देन ताकि भारत की पुलिस में गुणात्मक सुधारों के लिए एक पहल हो सके.

2 टिप्‍पणियां:

  1. जसवीर सिंह जी जैसे पुलिस अधिकारीयों को देख कर यह एहसास सहज ही हो जाता है की पुलिस व्यवस्था सही काम कर रही है और ऐसे पुलिस अधिकारीयों के वजह से यह देश और समाज घिसट कर ही सही चल रही है ,जिसदिन ऐसे पुलिस वाले भी भ्रष्ट और निकम्मे हो जायेंगे उस दिन यह देश और समाज नहीं बचेगा | इस देश के पुलिस अधिकारीयों को आज यह समझाने की जरूरत है की सत्य,न्याय और ईमानदारी की रक्षा हल हाल में की जानी चाहिए तथा पुलिस अधिकारी अपने पदों से ऊपर उठकर इंसानियत की रक्षा अगर तर्कसंगत व्यवहार तथा तर्कसंगत न्याय के आधार पर त्वरित कार्यवाही के जरिये करने लगेंगे तो इस देश में असल आजादी को लाना कोई मुश्किल काम नहीं रह जायेगा और यही बात मैंने कल सीतामढ़ी के SP श्री अनवर हुसैन जी से मीटिंग के दौरान भी रखा ,जिसपर श्री हुसैन ने हर सच्चे,अच्छे,और इमानदार व्यक्ति को हर संभव सहायता का हमें आश्वासन भी दिया | आगे वक्त आने पर उनके आश्वासन को परखा जायेगा | पुलिस निश्चय ही इस देश और समाज को सही राह दिखाने में एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता का सार्थक दायित्व निभा सकती है और ऐसा होना ही चाहिए और इस दिशा में हर IPS और पुलिस के छोटे -बड़े सभी कर्मचारियों को सोचना चाहिए | अंत में इंसानियत की रक्षा में सहायता और सहयोग के लिए श्री जसवीर जी (IPS ),श्री सुनील कुमार जी (IAS ),श्री निलेश जी (IPS ) औरhttp://www.iri.org.in/ का बहुत-बहुत धन्यवाद |

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  2. इस चर्चा की शुरुआत करने के लिए बंसल जी का धन्यवाद और इस पर चिंतन की आवश्यकता महसूस करने के लिए जसवीर सिंह जी को भी धन्यवाद. मैं बंसल जी की इस बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि संविधान बनाते समय इस ग्राम्य प्रधान देश की वास्तविकताओं का ध्यान नहीं रखा गया. पश्चिमी चिंतन और विश्विद्यालयी शिक्षा से अर्जित एक खोखली विशेषज्ञता के आधार पर चंद बुर्जुआ नेताओं ने जिस प्रकार का उधार का संविधान हम पर थोपा उसमें स्वाभाविक ही था कि ग्राम्य समाज और विशेष कर हाशिए पर खड़े लोगों की अवहेलना हो. पुलिस को अभी तक खिलौने अथवा स्टेट एपेरेटस के रूप में यही राजनीतिक वर्ग इस्तेमाल करता रहा है. अब यह इस हद तक सड़ चुका है कि इसे पूरी तरह डिसमेंटल कर नए सिरे से सृजन की आवश्यकता है. आपको यह सुझाव अत्यधिक रेडिकल भले ही प्रतीत होता हो लेकिन प्रशासनिक अवहेलना और भ्रष्टाचार से जूझ रहे इस देश के आम नागरिकों के समस्याओं की तुलना में ऐसा विचारों की अतिरेकता कुछ भी नहीं.

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