सोमवार, 11 जनवरी 2010

दुर्दशा हिंदी की

हिंदी हमारे देश भारत की घोषित राष्ट्र-भाषा है. किन्तु देश में जो सम्मान अभी भी अंग्रेज़ी को प्राप्त है, हिंदी उससे बहुत दूर है. इसके लिए भाषा या उपयोक्ता जिम्मेदार न होकर वे सब जिम्मेदार हैं जो हिंदी को अपना व्यवसाय बनाए बैठे हैं और इसे विकसित नहीं होने देते. इन व्यवसायियों में हिंदी के लेखक, प्रकाशक तथा राज्य-पोषित हिंदी विशेषग्य सम्मिलित हैं.


भारत के हिंदी-भाषी क्षेत्रों में जन-साधारण को पढने का शौक नहीं है, यह शिकायत हिंदी लेखकों तथा प्रकाशकों को है जो वर्तमान में सच भी है. किन्तु मैं पूछता हूँ कि हिंदी के लेखक या प्रकाशक भी पढने के कितने शौक़ीन हैं. लेखक केवल अपनी बात कहते हैं, किसी अन्य को सुनना या पढ़ना वे अपनी क्षुद्रता समझते हैं. और प्रकाशक तो बिलकुल भी नहीं पढ़ते और अपना व्यवसाय भी केवल राजकीय पुस्तकालयों के लिए चलाते हैं जिसके लिए पुस्तकों के मूल्य जनसाधारण की सीमा से कई गुना रखते हैं और राजकीय पुस्तकालयों में अधिकारियों को रिश्वत देकर अपनी पुस्तकें बेचते हैं. इस कारण से हिंदी प्रकाशन व्यवसाय में जन-साधारण के लिए साधारण मूल्य के पेपर-बेक संस्करणों का प्रचलन नहीं है.

इस विश्व-संजोग पर यदि हिंदी संलेखकों के पठन का अध्ययन करने से पता चलता है कि कोई भी संलेखक दूसरों के संलेखों को न देखता है और न पढ़ता है. गूगल ने दूसरों के संलेखों को पढने के लिए अद्भुत सुविधा प्रदान की हुई है उनके अनुसरण की, किन्तु इसका उपयोग चंद संलेखक ही करते हैं. प्रयोग के रूप में, मैंने अनेकानेक संलेखों का अनुसरण करके देखा है किन्तु इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप ही सही, कुछ अपवादों के अतिरिक्त, किसी ने भी मेरे संलेख देखने का कष्ट नहीं किया. इसमें इन संलेखकों के अहंकार भी एक महत्वपूर्ण कारण हैं. जबकि यदि आप किसी अंग्रेजी संलेख का अनुसरण करते हैं तो उसका लेखक आपके संलेख को देखेगा अवश्य, और पसंद आने पर उसका अनुसरण भी करेगा.  

हिंदी के इन व्यवसायी लेखकों ने हिंदी को केवल एक भाषा के रूप में जाना और माना है, कभी इसे ज्ञान-विज्ञानं के प्रचार-प्रसार का माध्यम नहीं बनाया. इसलिए हिंदी साहित्य अभी तक तोता-मैना के कृत्रिम किस्सों से ऊपर नहीं उठ पाया है. अंग्रेजी भाषा में जहां ८० प्रतिशत पुस्तकें ज्ञान-विज्ञानं के यथार्थ को समर्पित होती हैं, वहीं हिंदी पुस्तकों का नगण्य अंश ही ज्ञान-विज्ञानं के प्रसार में लगता है. इस पर भी शिकायत यह कि हिंदी क्षेत्रों में पुस्तकें नहीं पढी जातीं. तो क्या लोग केवल तोता-मैना के किस्सों में ही सदा-सदा के लिए अटके रहें. इसका भान किसी लेखक या प्रकाशक को नहीं है.

उदहारण के लिए विश्व-संजोग पर हिंदी संलेखों को ही देखिये, जो लगभग २० की सख्या में प्रतिदिन बढ़ रहे हैं, जिनमें लगभग ५० प्रतिशत प्रेम या विरह के गीतों अथवा कविताओं को समर्पित हैं. शेष में से अधिकाँश कहानी, किस्से, च्ताकले, फुल्झादियों आदि में लगे हैं. इस देश के नागरिक सनातन काल से समस्याओं से पीड़ित हैं, आज़ादी के बाद भी इन समस्याओं से कोई राहत नहीं मिल पायी है जब कि ऐसी अपेक्षाएं बढ़ी हैं. किन्तु हिंदी साहित्य और संलेखों को इन विकराल होती समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है. तो फिर क्यों कोई पढ़े इस साहित्य को या इन संलेखों को. लोग वही पढ़ते हैं जो उनकी समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करे थवा इन्हें उजागर करे.

हिंदी संलेखों पर टिप्पणी करना भी विशेष रूप धारण कर रहा है. वैसे तो गंभीर पाठक ही नहीं है तो टिप्पणीकार कहाँ से होगा? इस पर भी जो पेशेवर टिप्पणीकार उदित हुए हैं, वे चंद शब्दों को संलेखों पर च्पकाते जाते हैं जिनका संलेखों की विषय-वस्तु से कोई सरोकार नहीं होता. अंग्रेज़ी संलेखों पर टिप्पणी करने वाले ८० प्रतिशत टिप्पणीकार संलेखों को पढ़ते हैं और प्रासंगिक टिप्पणी करते हैं.

हिंदी और केवल हिंदी की यह विशेषता रही है कि इसमे जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा भी जाता है. विगत २० वर्षों में सरकारी दफ्तरों में बैठे हिंदी क्लर्कों ने हिंदी की इस विशेषता को भी ठिकाने लगा दिया. वर्तनी के ऐसे नियम बना दिए जिनमे अनुस्वार को अनेक उपयोगों में लिया जाने लगा है. इससे कोई सुविधा तो उत्पन्न नहीं हुई, केवल लिपि में विकृतियाँ उत्पन्न हुई हैं.