रविवार, 20 दिसंबर 2009

पृष्ठभूमि



लगभग २,००० वर्षों से गुलामी की जंजीरों से जकड़ा भारत और इसके लोग आज बहुत बुरी दशा में हैं - शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से. १९४७ में बलिदानों, सत्य और अहिंसा के बल पर पाई गयी स्वतंत्रता मुट्ठीभर लोगों ने अपनी अनंत हवस मिटाने के लिए कैद कर ली है. जनसामान्य के दमन और शोषण पर पनप रहे ये निरंकुश बने शासक लोकतंत्र का नारा लगाकर लोगों को पथ-भृष्ट कर रहे हैं ताकि वे उनके सामने अपना स्वर बुलंद करने योग्य न रह सकें और उनका वंशानुगत शासन चुपचाप सहते रहें.

मेरे बचपन में पिताजी ने एक कहानी सुनायी थी जो प्रसंगवश स्मृति-पटल पर उभर रही है -

"एक कारागार में अनेक कैदी थे. वैसे तो उनपर कोई विशेष बंधन नहीं थे किन्तु उनकी दोनों कुहनियों पर एक-एक शलाख बंधी थी जिसके कारण वे अपनी बाहें मोड़ नहीं सकते थे. जब उनका अनेक व्यंजनों वाला भोजन उनके सामने रखा जाता वे अपने अपने हाथों में ग्रास लेकर अपने-अपने मुंह में डालने का प्रयास करते किन्तु कुहनियों पर बंधी शलाखों के कारण उनके ग्रास मुंह में न जाकर इधर-उधर बिखर जाते. थोड़े से प्रयासों में ही भोजन समाप्त हो जाता और वे सब भूखे ही रह जाते......"

यही कथा सच्चाई है आज के भारत के लोगों की जिन्हें स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मताधिकार प्रदान किये गए हैं और जो उनके दास-संस्कारीय बंधनों के कारण उनके उपयोग में नहीं आकर उपरोक्त कैदियों के भोजन की तरह व्यर्थ जा रहे हैं और वे उसी प्रकार के शोषण और दमन का शिकार हो रहे हैं जैसे कि मुग़ल तथा अँगरेज़ शासनों में हो रहे थे.

"उपरोक्त कथा में आगे चलकर एक देव कारागार में आया और उसने उन सब कैदियों को एक मंत्र दिया. मंत्र का उपयोग करने से उनका भोजन व्यथ न जाकर उनकी उदर-पूर्ति करने लगा और वे खुशहाल हो गए, जबकि उनकी कोहनियों पर बंधी शलाखें यथावत बंधीं थीं."

आज भारतवासियों को एक ऐसे ही मंत्र कि आवश्यकता है ताकि उनके इतिहास-जनित संस्कारों के रहते हुए भी वे अपनी स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मताधिकार का सदुपयोग कर सकें और खुशहाल जीवन जी सकें. आइये देखें क्या था वह देव-दत्त मंत्र जिसके उपयोग से कैदी अपने भोजन का सदुपयोग कर सके.

पिताजी ने आगे बताया था, "देव ने उनसे कहा कि वे अपने हाथों से भोजन ग्रासों  को अपने-अपने मुख में ले जाने का प्रयास न करके एक दूसरे के मुख में डालें, जिसमें उन्हें कोई कठिनाई नहीं होगी. केवल आवश्यकता होगी आपसी सहयोग और विश्वास की."

कथा का यह मंत्र सार्वभौमिक और सार्वकालिक है किन्तु आज भारतवासियों को केवल परस्पर सहयोग एवं विश्वास ही पर्याप्त नहीं है, उनकी आवश्यकता है एक ऐसे शासन तंत्र की जिसका दुरूपयोग न हो सके तथा जो लोगों को उनकी मौलिक आवश्यकताओं - स्वास्थ, शिक्षा और न्याय के साथ-साथ सम्मानपूर्वक जीवन यापन का अवसर प्रदान कर सके.

लोगों का पेट केवल स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मताधिकार से नहीं भर सकता, न ही इनके दुरूपयोग से उनको सम्मान प्राप्त होता है. हाँ, इनसे वे भ्रमित अवश्य रहते हैं की उन्हें एक अनोखा ऐसा अधिकार मिला है जो पहले कभी नहीं मिला था. लोग स्वयं यह नहीं जानते की उन्हें वास्तव में क्या चाहिए ताकि वे एक संपन्न जीवन जी सकें. इसके लिए आवश्यकता है की देश का बौद्धिक वर्ग उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कोई मन्त्र आविष्कृत करे और उन्हें प्रदान करे.

इस संलेख के अधिष्ठाता ने इस विषय पर लगभग २० वर्ष गहन अध्ययन एवं चिंतन किया है जिसका परिणाम है एक नविन शासन प्रणाली 'बौद्धिक लोकतंत्र' जो वर्त्तमान लोकतंत्र से बहुत अधिक भिन्न नहीं है किन्तु जिसके माध्यम से देश का शासन देश के बौद्धिक वर्ग के हाथों में चला जायेगा जो लोगों को खुशहाली प्रदान कर सकेंगे.

इस संलेख की श्रंखलाओं में इसी नवीन शासन प्रणाली को उद्घाटित किया जायेगा ताकि देश का प्रबुद्ध वर्ग उसपर विचार कर सके, आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन कर सके तथा देश पर उसे लागू कर सके.