गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

अकादेमी की महत्वपूर्ण देने

अफलातून की अथेन्स में स्थापित अकादेमी की विश्व को सर्वाधिक विनाशकारी देनें ईश्वर, धर्म और अध्यात्म हैं. ईश्वर के नाम से मनुष्यों को भयभीत किया जाता है, धर्म उनकी बुद्धि को सुषुप्त  करता है तथा अध्यात्म उन्हें एक अनंत परिनामविहीन यात्रा पर बने रहने को उत्साहित करता है. इन के माद्यम से चतुर लोग जान-साधारण पर सरलता से अपना शासन बनाए रखते हैं. ये सभी पूरी तरह सारहीन हैं तथा मनुष्यों पर केवल मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाये रखती हैं. लम्बे समय तक चलते रहने से ये जान-मानस को एक विकृत संस्कृति के रूप में जकड लेती हैं जिससे इनसे पीछा छुड़ाना सरल नहीं होता. अकादेमी ने इन पर शोध किये और विश्व मानवता को गुलाम बनाने हेतु इनको विकसित किया.

यहाँ यह स्पष्ट करना प्रासंगिक है कि धर्म उस समय वेदों में प्रयोग किया गया लातिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ 'सोना' या 'सुलाना' है. अकादेमी में इस शब्द का अर्थ बदला और इसे मनुष्यों कि जीवन-चर्या में ईश्वर का प्रासंगिक बना दिया किन्तु इसका प्रभावी अर्थ वही रखा अर्थात ईश्वर के प्रसंग से धर्म द्वारा मनुष्यों कि बुद्धि को सुषुप्त करना. अफलातून तथा अरस्तु दोनों भारत निर्माण प्रक्रिया से प्रभावित थे और इसे अपने अधिकार में लेने को लालायित थे. वस्तुतः ईश्वर, धर्म तथा अध्यात्म जैसे झूठी मान्यताएं विकसित करने के पीछे उनका लक्ष्य भारत पर अधिकार करना था.


इन शोध परिणामों को कार्यान्वित करने की दिशा में सर्व प्रथम यहूदी धर्म बनाया गया. इसके अनुनायियों का एक विशाल दल भारत में धर्म का प्रसार करने हेतु भेजा गया. यही दल अपने साथ गाय और गन्ना लेकर आया जिनको भारत भूमि पर विकसित किया गया. यह भारत में यदु वंश का आगमन था. यदु वंश का प्रथम मुख्यालय दक्षिण भारत के मदुरै में बनाया गया जिसका तत्कालीन नाम मथुरा था. वेबस्टर dictionary  के अनुसार आज के मथुरा का तत्कालीन नाम मूत्र था. इस दल के अनुयायी जान-समुदायों में साधुओं के रूप में स्थापित हो गए और ईश्वर, धर्म और अध्यात्म का प्रचार प्रसार करने लगे.
जब ईश्वर का भय और धर्म का सुषुप्ति प्रभाव लोगों को भ्रमित करने लगा तो विकास कार्य में लगे देवों ने इनका विरोध करना आरम्भ किया जिससे देवों तथा यदुओं में संघर्ष कि स्थिति उत्पन्न हो गयी.

अकादेमी ने उक्त संघर्ष में यदुओं कि सहायता के लिए आगे शोध किये और एक गर्भवती यदु स्त्री यशोदा के गर्भ से मूल भ्रूण निकालकर एक अन्य भ्रूण को बैंगनी वर्ण में रंग कर स्थापित कर दिया जिसके परिणाम-स्वरुप बैंगनी वर्ण का कृष्ण उत्पन्न हुआ. इस विशिष्ट रंग के शिशु को ईश्वर का अवतार घोषित कर जोरों से इसका प्रचार प्रसार किया गया. अकादेमी के विशेषज्ञों का एक दल आज के श्रीलंका द्वीप पर ठहरा और कृष्ण को छल-कपट तथा बाजीगरी कि कलाओं में प्रशिक्षित करने लगा. इन कलाओं के माध्यम से जन-साधारण में कृष्ण को ईश्वर के अवतार के रूप में सिद्ध करना सरल हो गया. गोवर्धन पर्वत का उठाना, शेष-नाग को वशीभूत करना आदि इन्ही बाजीगरी कलाओं के रूप थे जिनके माध्यम से जन-साधारण को कृष्ण कि अद्भुत क्षमताओं से प्रभावित किया गया.

जैसे-जैसे कृष्ण बड़ा होता गया, उसका ईश्वरीय आतंक देवों के विरुद्ध विकराल रूप धारण करता गया जिसमें उसे जन-साधारण का समर्थन भी प्राप्त हो रहा था. छल-कपटों तथा बाजीगरी कलाओं से देवों को मन-गढ़ंत कहानियों के प्रचार-प्रसार से बदनाम किया जाने लगा तथा उनकी एक-एक करके हत्याएं की जाने लगीं जिनमे कंस, कीचक, जरासंध, रक्तबीज आदि प्रमुख थे.

यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि धर्मावलम्बियों ने कोई ग्रन्थ नहीं लिखा केवल देव ग्रंथों के गलत अनुवाद करके उनमे ईश्वर, धर्म, अध्यात्म, कृष्ण आदि विषयों को आरोपित किया. इस कार्य में शंकराचार्य ने विशेष भूमिका निभायी क्योंकि उस समूह में वही एकमात्र शिक्षित व्यक्ति था. गलत अनुवादों को पुष्ट करने के लिए वेदों तथा शास्त्रों में प्रयुक्त लातिन एवं ग्रीक शब्दावली के अर्थ बदले गए और नए अर्थों को पुष्ट करने के लिए आधुनिक संस्कृत भाषा बनाई जिसका वेदों तथा शास्त्रों की भाषा से कोई सम्बन्ध नहीं है. इन दोषपूर्ण अनुवादों के कारण ही जन-मानस में कृष्ण आज तक भगवन के रूप में स्थापित है.