सोमवार, 15 जुलाई 2013

महाभारत एक नकली ग्रन्थ है

विगत कुछ वर्षों से मैं भारत के प्राचीन इतिहास को जानने के लिए महाभारत और अन्य वैदिक ग्रंथों की छानबीन करता रहा हूँ, और अंत में मैंने महाभारत को वेद व्यास द्वारा रचित एक अधिकृत एवं पुष्ट ग्रन्थ मानते हुए इसका सही अनुवाद करने के प्रयास किये. इस ग्रन्थ का उपक्रम आरम्भ करने से पूर्व अनेक कथाएँ दी गयी हैं जिन पर सरसरी नज़र डालते हुए मैं उपक्रम पर पहुंचा। इससे मुझे भारी आघात पहुँचा .


महाभारत के उपक्रम (अंशावतार पर्व) के श्लोक ५ तथा ६ का मूल पाठ इस प्रकार है -

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आगे श्लोक ९ में लिखा है -

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उपरोक्त के संदर्भित सार इस प्रकार हैं -

व्यास के कथनों एवं चित्रित आख्यानों में भारत को महत्व दिया गया। महाभारत आख्यान पांडवों का यशोगान करने हेतु है . जनमेजय की पृष्ठभूमि के स्थान पर कृष्णद्वैपायन को खड़ा किया गया है ..

.....  कृष्णद्वैपायन के मतानुसार महाभारत कथा का आरम्भ होता है .

ग्रन्थ के उपक्रम में निस्संदेह लिखा है की वेद व्यास द्वारा 'भारतं' नामक ग्रन्थ की रचना की गयी थी, जिसका प्रमुख केंद्र भारत भूमि था . निस्संदेह उसमें तत्कालीन भारत के घटनाक्रमों का यथार्थ उल्लेख किया गया होगा, जो पांडव समर्थकों को पसंद नहीं आया. अतः उनके मार्ग दर्शक ने एक अन्य ग्रन्थ की रचना करा डाली जिसका नाम 'महाभारत' रखा गया. उपरोक्त उपक्रम में स्पष्ट लिखा है कि महाभारत की रचना कृष्ण द्वैपायन ने की जिसकी विषयवस्तु का लक्ष्य पांडवों का यशोगान करना था। यही महाभारत ग्रन्थ आज उपलब्ध और प्रचलित है, जो स्पष्ट रूप से तत्कालीन घटनाक्रम को तोड़-मरोड़ कर पांडवों के पक्ष प्रस्तुत करता है।



इस तथ्य को छिपाए रखने के लिए तथाकथित विद्वानों ने एक और छल किया जिसके अंतर्गत उन्होंने कृष्ण द्वैपायन को वेड व्यास का दूसरा नाम घोषित कर दिया, जिसके कारण महाभारत को वेद व्यास द्वारा रचित घोषित कर दिया गया, जो उपरोक्त उपक्रम में उल्लिखित तथ्य के विपरीत है. इस प्रकार वेड व्यास ने कोई महाभारत नामक ग्रन्थ नहीं रचा, उनके द्वारा रचित ग्रन्थ का नाम 'भारतं' था जो मेरी सूचना के अनुसार अब उपलब्ध नहीं है. यदि किसी सज्जन को 'भारत' की पांडुलिपि की कोई सूचना तो मुझे सूचित कर कृतार्थ करें।

कृष्ण द्वैपायन के विषय में मेरी धारणा है कि वह कृष्ण का डुप्लीकेट पात्र था जिसके माध्यम से कृष्ण को एक से अधिक स्थानों पर उपस्थित दिखाकर उसकी दिव्यता सिद्ध की जाती थी। इससे पांडवों के मूर्ख तथा दुश्चरित्र होने का मेरा संदेह भी सिद्ध होता है अन्यथा उनके यशोगान के लिए एक अन्य ग्रन्थ लिखने की आवश्यकता ही नहीं थी' वेद व्यास द्वारा रचित 'भारतं' ही पर्याप्त था जिसमें वास्तविकता दर्शाई गयी होगी।

इसके साथ ही गीता, जो महाभारत का एक अंश है, भी अनाधिकृत सिद्ध हो जाती है जिसमें निष्काम-कर्म जैसे मूर्कातापूर्ण दर्शन को ज्ञान कहा गया है.   

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