रविवार, 31 अक्तूबर 2010

अपनी पहचान और परिभाषा

जन-साधारण सदैव भीड़ के अंग बने रहकर सुरक्षित अनुभव करते हैं जब कि विशिष्ट व्यक्ति वही सिद्ध हो पाते हैं जो भीड़ तथा एकांत में भी सामान्य व्यवहार बनाये रखते हैं. यहाँ भीड़ में रहने में यह भी सम्मिलित है कि वे अपने व्यवहार तथा स्वरुप को भी अधिकाँश लोगों की तरह का बनाये रखते हैं, इन के माध्यम से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने से भी वे कतराते हैं जब कि विशिष्ट व्यक्ति अपने रूप और व्यवहार से अपनी विशिष्ट पहचान बनाने हेतु सदैव प्रयासरत रहते हैं. ऐसी पहचान बनाने के लिए साहस की आवश्यकता होती है जो सभी में नहीं होता. इस प्रकार की पहचान ही व्यक्ति की सामाजिक परिभाषा होती है.

जैसा कि ऊपर कहा गया है व्यक्ति की सामाजिक परिभाषा के दो पहलू होते हैं - स्वरुप और व्यवहार. इन दोनों के संयुक्त योगदान को ही व्यक्तित्व कहा जाता है. स्वरुप की दृष्टि से व्यक्ति की पहचान अनेक प्रकार से बनती है - उसके प्राकृत अंगों की विशिष्टता से, यथा उसके बैठने, खड़े होने अथवा चलने की शैली से, उसके बात करने की शैली से, उसकी विशिष्ट आदतों से, उसकी केश-सज्जा से, तथा उसकी वेशभूषा से. चूंकि व्यक्ति के व्यवहार से पूर्व उसका स्वरुप उसका प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए व्यक्ति का प्राथमिक प्रभाव उसके स्वरुप से संचालित होता है. इसमें उसके शारीरिक सौन्दर्य का कोई महत्व न होकर उसकी विशिष्ट शैली का महत्व होता है, यद्यपि शारीरिक सौन्दर्य का भी अपना महत्व होता है.

विशिष्टता के लिए लिए व्यक्ति का स्वरुप ऐसा होना चाहिए कि अन्य लोगों में उसे देखते ही उसके बारे में जिज्ञासा जागृत हो  यही जिज्ञासा ही उसे समाज में प्राथमिक स्तर पर विशिष्ट व्यक्ति बनाती है किन्तु उसके व्यवहार से इस विशिष्टता की पुष्टि होनी अनिवार्य होती है, अन्यथा उसके स्वरुप की विशिष्टता से स्थापित विशिष्टता खोखली रह जाती है. इसलिए व्यक्ति का विशिष्ट व्यवहार ही उसकी विशिष्टता को स्थायित्व प्रदान करता है. विशिष्ट व्यवहार का स्रोत व्यक्ति का चरित्र होता है जिससे उसका मंतव्य निर्धारित होता है, और मंतव्य ही उसके प्रयासों का जनक होता है. अतः मूल रूप से सुचरित्र व्यक्ति ही समाज में अपनी विशिष्ट पहचान बना पाते हैं. 

स्वरुप और व्यवहार की दृष्टि से विशिष्ट व्यक्ति भी तीन प्रकार के होते हैं - विकृत, असामान्य और असाधारण. यद्यपि शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति भी विकृत होते हैं किन्तु सामाजिक दृष्टि से मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति ही विकृत माने जाते हैं. ये समाज में स्वीकार्य नहीं होते. असामान्य व्यक्ति वे होते हैं अन्य लोगों से स्वरुप अथवा व्यवहार में भिन्न होते हैं किन्तु उनकी समाज को कोई देन नहीं होती, इसलिए समाज में इनका भी कोई विशेषत महत्व नहीं होता. समाज में विशिष्टता की स्थापना के लिए यह अनिवार्य है कि व्यक्ति का मानव समाज और सभ्यता के विकास में कुछ योगदान हो. ऐसे व्यक्ति समाज में असाधारण माने जाते हैं और समाज इन्हें विशिष्ट मान्यता प्रदान करता है. इसमें व्यक्ति के स्वरुप का कोई विशेष महत्व न होकर उसके व्यवहार का ही महत्व होता है. किन्तु उसका स्वरुप उसके विशिष्ट व्यवहार के लिए पृष्ठभूमि तैयार करता है.
Personality

किसी भी व्यक्ति के विशिष्ट होने में उसके मंतव्य, प्रयास और परिणामों का सम्मिलित योगदान होता है. यद्यपि मंतव्य से प्रयास और प्रयास से परिणाम उगते हैं तथापि परिस्थितियां मंतव्य, प्रयासों और परिणामों में अंतराल ला देती हैं. व्यक्ति अपने स्तर पर अपना मंतव्य ही निर्धारित कर सकता है जिसके अनुरूप प्रयास करना भी अंशतः उसकी पारिस्थितिकी पर निर्भर करता है. समाज प्रायः व्यक्ति के मंतव्य को महत्व न देकर उसके द्वारा उत्पादित परिणाम ही देख पाता है. इसके कारण अनेक असाधारण व्यक्ति भी समाज में अपनी विशिष्ट पहचान नहीं बना पाते यद्यपि उनके मंतव्य विशिष्ट होते हैं.