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गुरुवार, 10 जून 2010

अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षा का आडम्बर

भारत में जब किसी परिवार को भर पेट भोजन मिलने लगता है तब वह अपने बच्चों को अच्छे शिक्षा प्रदान करने की इच्छा रखने लगता है. ऐसे लोगों को ललचाने के लिए देश भर में अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की भरमार है, जिनके विविध स्तर और शिक्षा प्रदायन के मूल्य हैं, किन्तु ये निश्चित रूप में देसी भाषा माध्यम शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों की तुलना में १०० से १००० गुणित तक महंगे हैं. ऐसे बहुत से विद्यालयों के महलों जैसे भवन हैं जिनसे वे धनी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. इन्हें पब्लिक स्कूल कहा जाता है जबकि देश की पब्लिक से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता.

गाँव में रहकर मैं कुछ ऐसे बच्चों का मार्गदर्शन भी करता हूँ जिनके माता-पिता उनकी शिक्षा के प्रति गंभीर प्रतीत होते हैं. मेरे संपर्क में आने वाले इस प्रकार के बच्चों में अधिकाँश बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालयों में शिक्षा पा रहे होते हैं. इससे मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि शिक्षा के प्रति गंभीर सभी माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालयों में शिक्षा प्रदान कराना चाहते हैं. इनमें से भी अधिकाँश वे होते हैं जो अभी या कभी राजकीय वेतनभोगी रहे हैं, क्योंकि देश का यही मध्यम वर्ग अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षा का आर्थिक भार सहन करने में समर्थ है.

इस प्रकार के अनुभवों से कुछ शिक्षाप्रद तथ्य मेरे हाथ लगे हैं -
  • शिक्षा में माता-पिता की गंभीरता केवल आर्थिक भार सहन करने की क्षमता होती है, ना कि बच्चों को मार्ग दर्शन देने की क्षमता. 
  • माता-पिता की गंभीरता यह अर्थ कदापि नहीं है कि बच्चे भी अपनी शिक्षा में गंभीर हों. अतः माता-पिता पर आर्थिक भार बच्चों की अच्छी शिक्षा में निश्चित रूप से परिवर्तित नहीं होता. 
  • अंग्रेज़ी माध्यम शिक्षा के अत्यधिक महंगी होने का यह कदापि अर्थ नहीं है कि विद्यालय बच्चों को अच्छी शिक्षा प्रदान करने में रूचि रखते हैं अथवा वे इसमें समर्थ होते हैं. किन्तु निश्चित रूप से इनमें शिक्षा प्रदान करने का आडम्बर उच्च स्तर का होता है. 
  • अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालयों में अंग्रेज़ी के पाठ्यक्रम ऐसे होते हैं जिन्हें ९० प्रतिशत बच्चे समझ ही नहीं सकते. ऐसे अनेक विद्यालयों में अंग्रेज़ी के अध्यापक भी पाठ्यक्रम को समझने में असमर्थ होते हैं. इन कारणों से बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़ने की मात्र औपचारिकता पूरी की जाती है जिसके लिए उनकी पुस्तकों में केवल चिन्हित अंशों को रटाने की परम्परा है. इस कारण से इन विद्यालयों के ९० प्रतिशत बच्चों का अंग्रेज़ी भाषा ज्ञान लगभग शून्यस्थ ही रहता है जिसके कारण वे प्रायः विद्यालय अथवा शिक्षा का परित्याग करते रहते हैं. 
  • ऐसे विद्यालयों में अन्य विषयों की शिक्षा भी अंग्रेज़ी माध्यम से होती है. अतः ९० प्रतिशत बच्चे इन विषयों के प्रश्नों को भी समजने में असमर्थ रहते हैं इसलिए समुचित उत्तर भी नहीं दे पाते. इसके कारण भी बच्चे प्रायः विद्यालय अथवा शिक्षा का परित्याग करते रहते हैं.         
कुछ उदाहरण यहाँ प्रासंगिक हैं. मेरे वर्त्तमान संपर्क में कक्षा ८ के एक बच्चे की अंग्रेज़ी पुस्तक का प्रथम पाठ शेक्सपिअर की एक गूढ़ दार्शनिक कविता है. विद्यालय जनपद में अति प्रतिष्ठित है जिसकी शिक्षा शुल्क ही ६०० रुपये प्रतिमाह है तथा होस्टल आदि का सकल व्यय लगभग ३००० रुपये प्रति माह है. विगत अप्रैल माह में इस पुस्तक के ५ पाठों को पढ़ा दिया गया मान लिया गया है जिनमें से बच्चे को ग्रीष्मावकाश में करने हेतु होम वर्क दे दिया गया है, जबकि बच्चे की समझ में कुछ भी नहीं आया है.
Education in the Emerging India 
एक अन्य बच्ची कक्षा ९ की है जो आरम्भ से ही अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय में पढ़ती रही है. उसे कभी भी अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवाद तथा अंग्रेज़ी व्याकरण नहीं पढाई गयी इसलिए उसका अंग्रेज़ी ज्ञान शून्यस्थ है जिसके कारण वह गणित के प्रश्नों को भी नहीं समझ सकती. तथापि कक्षा ८ की परीक्षा में उसने ७० प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे. माता-पिता को बच्ची  के अच्छे अंकों पर बहुत गर्व है. मेरे समक्ष वह अंग्रेज़ी की पुस्तक खोलने से भी कतराती है. इस भय के कारण उसका स्वास्थ भी खराब है.